Wednesday, June 2, 2021

बुनी हुई बातें

           

बुनी हुई बातों में

साँसें नहीं होतीं।

ठहाके,सिसकियाँ

उत्साह,गुदगुदी

दुःख,पीड़ा

आस,उम्मीद

थकान,आवेग

सबके बावजूद

मुर्दा होती हैं

बुनी हुई बातें।

           -अमृत उपाध्याय

           (Amrit Upadhyay)


Saturday, May 22, 2021

बात अटकी है जो सीने में

                                              

            -अमृत उपाध्याय

रात बेचैनी की गिरफ्त में जकड़ी है बहुत

गिनती साँसों की भी बेमेल लग रही है बहुत

खौफ़ हर नब्ज़ पर कब्ज़ा जमा रहा है आज

ख्वाब एक-एक कर अब छोड़ने लगे हैं साथ

ये कैसा दौर है, अब तुमसे मैं क्या-क्या कहूँ

वक़्त को आज़माने की जिद्द बस छोड़ दो अब

वक़्त की साजिशों की परतें खुल रहीं देखो

तुमने इक बात जो यूँ ही कही थी मुझसे कभी

वही इक बात आज अटकी है मेरे सीने में।


सिलसिला बातों का बेमोड़ ही ठहरे न कहीं

मैंने समझाईं तुम्हें अब तलक जितनी बातें

याद करना उन्हें जो तुमने अनसुनी की थीं

मेरी बातों में फ़लसफ़े भले न मिल पायें

वक़्त की कद्र करना सीख लो बस काफी है

वक़्त को आज़माने की जिद्द अब छोड़ ही दो

तुमने इक बात जो यूँ ही कही थी मुझसे कभी

वही इक बात आज अटकी है मेरे सीने में।


ज़्यादा मायूस, नाउम्मीद तुम न हो जाना

बातें झुठलाने की टकराहटें भी होंगी अभी

रौशनी आस की पाके मिल रहा है सुकून

हौसला खौफ़ को झटके से कर रहा बेदम

गहरी साँसों ने थामी है हरेक नब्ज़ की डोर

ख़्वाब जो बच गए हैं साथ नहीं छोड़ेंगे

सफ़र का आफताब तक पहुँचना बाकी है


पर तुमने इक बात जो यूँ ही कही थी मुझसे कभी

वही इक बात आज अटकी है मेरे सीने में।

  -अमृत उपाध्याय। (Amrit Upadhyay)

Friday, May 7, 2021

माँ की तालीम

            -अमृत उपाध्याय

बचपन से ही,

मैं जब भी कहीं जाता था घर से

 माँ से कहता था 

'मैं जा रहा हूँ'

जवाब में हर बार  कहती थी वो मुझे

' लौटकर आओ'


मैं सोचता था

हर बार मेरे जाने की ख़बर में

'आना' क्यों तलाशती है माँ?


उसे पता तो है 

जाने और लौटने का फ़र्क़

 कि जाना तय है

अनिश्चितता, लौटने में है।


झेला है माँ ने 

जाकर न लौटने का दुख

असह्य पीड़ा

शूल की तरह चुभन से उठता दर्द

 कभी न ख़त्म होने वाला

लौटने का इंतज़ार।


वो जानती तो है कि

लौटने को कह देने से

कोई लौट नहीं आता।


फिर यह महज कह देने भर की

रवायत नहीं होगी हरगिज़


कुछ पुख़्ता रहा होगा

 इन बातों का फ़लसफ़ा


जैसे-जैसे बचपन छूटता गया

समझ आता गया

माँ की बातों का मतलब,

 जाने और लौटने का फ़र्क


लौटता वो है 

जिसमें हो जीवटता

जिसे आता हो हालात से लड़ना

जो अंत तक नहीं छोड़ता उम्मीद 

जिसमें अंतिम दम तक 

हौसला बनाये रखने की हो ताक़त

जो नहीं टेकता घुटने अंतिम सम्भावना तक

जो होशोहवास में नहीं मानता हार


 मैं लौट आता हूँ हर बार

क्योंकि जब भी मैं जाता हूँ कहीं

माँ हर बार देती है 

लौट आने की तालीम मुझे।

             --- अमृत उपाध्याय

                (Amrit Upadhyay)


Tuesday, May 4, 2021

रात महबूब हो जैसे!

                    

         -अमृत उपाध्याय 

मैं जब भी उजाले के हिस्से जाता हूँ

रात वापस खींच लाती है

रात महबूब हो जैसे।


आखिरी पहर तक सहलाती है मुझको

खूब बतियाती है मुझसे देर तक

सोने नहीं देती पर लोरी सुनाती है।


चांदनी ओढ़ लहराती है मुझमें,

हवाखोरी कराती है। 

रात इतराती है, इठलाती है, 

और कहकहाती है।

रात बेलौस-सी,

 बेफ़िक्री में जीना सिखाती है।


माज़ी में झाँकती है मेरे

बीते किस्से सुनाती है

बहुत कुछ अनकही और अनसुनी-सी 

मुझे अक्सर बताती है।

रात बीते हुए लम्हों को मेरे

बहुत क़रीब लाती है

मैं महसूस कर लेता हूँ उनको

जिन्हें अब मिल नहीं सकता।

मैं दस्तक दे दिया करता हूँ उनको

जिन्हें कुछ कह नहीं सकता।


रात तिलिस्म है, अय्यार है मानो

मैं जब भी उलझा रहता हूँ

वो हरदम जान जाती है

मेरे सीने में हर रेशे की उलझन

खोलती है वो

रात आईना हो जैसे

मुझे, मुझसे मिलाती है।

   

मैं जब भी उजाले के हिस्से जाता हूँ

रात वापस खींच लाती है।

रात महबूब हो जैसे।

             - अमृत उपाध्याय 

              (Amrit Upadhyay)


Monday, May 3, 2021

मुझे बस नींद आ जाए...

         -अमृत उपाध्याय

 सरसराती तेज़ तूफानी हवाएँ

 दहशत उड़ेल रही हैं मुझमें

रात है घनघोर जिसमें

कड़कड़ाती बिजलियों के गरजने से

रगों में ख़ौफ़ के टुकड़े 

पसरते जा रहे हैं 


मैं इनसे बच के सोना चाहता हूँ

 सुनहरे ख़्वाब की आग़ोश में

मुझे बस नींद आ जाए


मैं इनसे बच के सोना चाहता हूँ

कि जैसे माँ की कोख में 

घुड़का हुआ 

बेफ़िक्र पलटी मारते सोता है बच्चा 


मैं इनसे बच के सोना चाहता हूँ

कि जैसे माली की हथेलियों से घिर कर

आँख मूँद अलसाता है एक नन्हा पौधा


मैं इनसे बच के सोना चाहता हूँ जैसे 

हज़ारों फीट ऊँचे पर्वतों पर 

टूटते चट्टानों से बेफिक्र होकर

गुनगुनी-सी धूप में 

सोते हैं परिंदे

मैं इनसे बच के सोना चाहता हूँ 

कि जैसे गहरी काली रात में

चुपचाप, बिना देखे दिखाए

फ़लक पर तान कर सोता है चंदा


मैं सोना चाहता हूँ 

 सुनहरे ख़्वाब की आग़ोश में

मुझे बस नींद आ जाए।।

                   ---अमृत उपाध्याय

                (Amrit Upadhyay)

Monday, March 29, 2021

थोड़-सा 'मैं'

 तेरे भीतर 

थोड़ा-थोड़ा

मैं बसता था।


आँखों में तेरे

थोड़े आँसू 

मेरे थे।


तेरे धड़कन की

थोड़ी साँसें 

मेरी थीं।


चेहरे में तेरे

मैं भी थोड़ा दिखता था।


रातों में चांद की

थोड़ी चांदनी  

मेरी थी।


तेरे सपनों में 

मेरी यादों का 

 हिस्सा था।


तेरे भीतर का

 थोड़ा-सा मैं

 टूट गया हूँ।


तुझमें खुद के

बिखरे टुकड़ों को

ढूँढ रहा हूँ।

          -- अमृत उपाध्याय

Friday, March 26, 2021

'मैं' और 'वह'

 फ़रेब ओढ़ने की हुनर से

तय होंगे

 ज़िंदगी के रास्ते 


नक़ाब की परत-दर-परत

बढ़ती जाएगी

तज़ुर्बे की शोहरत 


आईने के उस पार

दरकती जाएगी

मेरी परछाईं


'मैं' धीरे-धीरे

बन जाएगा 

'वह'


एक दिन जब तुम्हारी नज़रें

खोजेंगी मुझे 'उसके' हासिल में

'मैं' नहीं मिलूंगा तुम्हें

कभी भी, कहीं भी।

                 - अमृत उपाध्याय

Thursday, May 28, 2020

बीच सफ़र में...

 ये सड़कें,
बिल्कुल सपाट-सी तो नहीं,
लेकिन इतनी,
कि चिढ़ा सकें
गाँव और कस्बों से
मोटरी बाँधकर आए लोगों को
और लजा जाएँ हमारे जैसे चंद लोग।
                               चंद क्यों?
                               पूरी जमात ही
                               जो रोटी की तलाश में
                               समा गए बड़े शहरों में।
जिन्हें सुकून नहीं मिलता सोचकर
कि भागते-दौड़ते लोगों के पीछे लगकर
सही तो किया न?

                             लजा तो मैं भी जाता हूँ,
                             रोज़।
                             उनकी तरह
                             जो नहीं जानते तहज़ीब,
               कि सोये हुए इंसान की खुली आँखें
              और खुली आँखों वाला सो रहा इंसान
                   इस सड़क की ज़रूरत है।
                    वाजिब ज़रूरत,
                    शायद।।
                                     -- अमृत उपाध्याय 

Saturday, May 23, 2020

दुनिया गोल है...




कोरोना ने ज़िंदगी की गाड़ी को उसी पटरी पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से चलना शुरू किया था। कैसे
 ? ये बाद में बताउँगा। फिलहाल आगे बढ़ने से पहले एक महान इंसान द्वारा मुझे दी गई नसीहत को दुहरा दूँ। दुनिया गोल है, उस महान आदमी ने मुझसे तब कहा था जब मैं 17 साल का था। 18 साल और गुज़र गए अनुसंधान करने में। रिसर्च का हासिल यही है कि बात सही है। 

                    ज़िंदगी भर मुझे लगता रहा कि पता नहीं लोग फिज़ूल की बातें क्यों लिखते हैं? हल्की,भारी,सीधी,टेढ़ी, न जाने कितनी तरह की बातों को अलग-अलग खाँचों में बैठाते आया हूँ अबतक। कुछ काम की थीं, कुछ बेमतलब की। ये भी फिज़ूल की ही बातें हैं, जो इसके पहले वाली दो लाइनों में पढ़ी आपने । आपके साथ भी होता होगा ऐसा, सबके साथ होता है शायद। इन्ट्रोवर्ट और एक्स्ट्रोवर्ट के चक्कर में बचपन में ही फँसने लगा था दिमाग। दिमाग का मोटर 12-13 साल की उम्र से ही रात को माइकल शुमाकर बन जाता था। उसी समय से रात-रात भर जागना, सोचना, लिखना, अकुलाना शुरू हो गया था। मन में उथल-पुथल मची रहती थी, बेचैनी-सी महसूस होती रहती थी। फिर डायरी, ए फोर, सादा कागज, भरा कागज, अखबार, ठोंगा जो सामने मिल जाए दिमाग में चल रही बातों को लिख देता था। कई बार पढ़ कर लगता था मैंने ही लिखा है ये? बाद में कभी ये भी लगता कि फालतू की बातें लिखी हैं। तब से लंबे समय तक न जाने दिमाग में कितनी बातें स्क्रिप्ट की शक्ल में बौखलाहट मचाती रहती थीं। कितने ही पन्ने रोज़ मन ही मन भर लिया करता था। लेकिन समय कब कहाँ किसकी मुट्ठी में बँधने के लिए मोहताज है। जो कागज पर नहीं उतरा, समझिए पैदा होने से पहले मर गया। अब ऐसा ही लगता है मुझे। उन खाँचों ने जो मैंने ही बना दिए थे, न जाने कितने शब्दों की जान ले ली जन्म से पहले ही। खैर, जो मर गए उन्हें कौन बचा लेता। लेकिन जिसे चाहकर भी आप नहीं मार सकते वो है तजुर्बा, अनुभव। धीरे-धीरे होने की चीज़ है, तो वैसै ही हुआ धीरे-धीरे। समझ आया कि – इट्स ऑल अबाउट परसेप्शन। मेरा आपके बारे में, आपका मेरे बारे में, मेरा मेरे बारे में और आपका आपके बारे में।  या फिर किसी का किसी के बारे में बना हुआ परसेप्शन स्ट्रॉन्ग होता है बहुत। वो सोचने की उसी दिशा में आपको ले जाता है जहाँ सोचने का अंत होता है। और हाँ, आप जिस शब्द को बचपन से घोल कर पी चुके हैं मेरी तरह यानी मेच्योरिटी, वही मेच्योरिटी कहती है कि मेच्योर होने का एक मतलब ये भी है कि परसेप्शन क्रिएट करने से बचने की कोशिश कीजिए। कोशिश इसलिए क्योंकि परसेप्शन से पूरी तरह बचना लगभग नामुमकिन लगता है मुझे और बचने की कोशिश करना भी कठिन काम जान पड़ता है। फिर भी यही कहूँगा कि परसेप्शन बनाने से बचिए,दूसरों के बारे में भी और अपने बारे में भी। हाँ, सोचे-समझे तरीके से अगर किसी ने किसी के बारे में परसेप्शन बनाया-बिगाड़ा तो समझिए वो पहले से ही मेच्योर है। भावनात्मक चासनी में गोते लगाने वालों को बचने की ज़रूरत है। आपने भी न जाने कितनों पर मेच्योर न होने का आरोप मढ़ा होगा और कितनों को मेच्योरिटी की शाबाशी दी होगी- ये भी परसेप्शन ही है।                                                                हाल ही में मेरी एक सहयोगी ने अपनी एक कविता भेजकर मुझसे पूछा था कि मैंने पहली बार कविता लिखी है। बताइए अच्छा लिख पायी हूँ या नहीं? किन बातों का ख्याल रखना चाहिए, कौन सी गलतियाँ हुईं हैं? मैंने उनसे कहा कि अच्छा लिखने के लिए ज़रूरी है कि  अच्छा लिखने की कोशिश भूल कर भी न की जाए और न ही ये सोच कर लिखिए कि पढ़ने वाले को कैसा लगेगा? अगर आपने ये सोच कर लिखना शुरू किया कि पढ़ने वाले को कैसा लगेगा, तो समझिए आपके और आपकी लिखने के बीच किसी तीसरे को आपने पहले ही इंट्री दे दी है। कहने का मतलब ये कि जो लिखने का मन करे लिखिए, ज़रूरी नहीं कि कलम उठा कर इतिहास ही रच डालिएगा। न ये ज़रूरी है कि साहित्य लिख डालिएगा। क्या रचेगा और कौन पढ़ेगा इसकी चिंता छोड़िए लेकिन लिखना मत छोड़िए, नहीं तो लिखने में जब मजा आना बंद हो जाएगा और लिखने की धार जब मंद पड़ जाएगी तो फिर सालों इंतजार करना पड़ेगा अपनी बारी फिर से आने का। दिमाग में बातों का बवंडर उठना बंद हो जाएगा। कुछ सूझना बंद हो जाएगा। फिर कई सालों बाद शायद अक्ल की घंटी फिर से टुनटुनाये। जैसा मेरे साथ हो रहा है आजकल। कुछ लोग इस बात की आलोचना कर सकते हैं कि आजकल कोई भी कुछ भी लिख रहा है। सारे लेखक हुए जा रहे हैं। ये भी हो सकता है कि किसी का लिखा पढ़कर आपको सिर पीटने का मन करे। लेकिन ज़माना प्रकाशकों और सेटेलाइट चैनलों से बहुत आगे निकल चुका है। ज़ाहिर है लिखने वालों और रचने वालों की भरमार है।इंटरनेट ने असीमित जगह पैदा किया है लिखने,बोलने या गाने वालों के लिए। मोनोपोली टूटने का बाइप्रोडक्ट है गैर-ज़रूरी चीजों की भरमार लगना। जिन्हें दुख होता है सोचकर कि आजकल लोग कुछ भी लिख रहे हैं, उनके सामने विकल्प है छोड़कर आगे बढ़ने का। 
ये तो एक पक्ष है। दूसरा पक्ष ये है कि इंटरनेट पर उपजी नई पौध में से कई बेहद कमाल के राइटर हैं। अगर किसी प्रकाशक के भरोसे होते तो ये कभी सामने नहीं उभर सकते। इसलिए लिखिए, क्या पता कुछ बेमिसाल सामने आ जाए। जिन लोगों ने लिखना छोड़ दिया है 8-10 साल पहले मेरी तरह वो भी 
लिख सकते हैं क्योंकि पढ़ने की उम्र नहीं होती तो लिखने की कौन-सी होती है? अब से लिखेंगे- कोई गारंटी नहीं है कि आपको अच्छा लगे या गलियाने का मन करे। 
ऐसा ही तब सोचता था 17-18 साल पहले,बीच में इधर-उधर की सोचता रहा और अब फिर वैसा ही सोचने लगा हूँ। क्योंकि 17-18 साल में घूम-फिर कर वहीं खड़ा हो गया हूँ जहाँ से शुरू किया था। ऊपर लिखा था न- दुनिया गोल है, जहाँ से शुरू करते हैं वहीं पहुँच जाते हैं घूम-फिर कर। बस फर्क ये है कि आप वो नहीं होते जो चलते समय थे।


---अमृत उपाध्याय (21-05-20)




Friday, May 15, 2020

अस्तित्त्व की शर्त




अस्तित्त्व की शर्त

सुना है
कैद हो तुम आजकल
तुम्हारे गुमान की रोशनी पर
अँधेरा मंडराने लगा है अब
तुमने जो रेशमी जाल बने थे
अपनी जीत के लिए
उसी में घुट रहे हो
दिन-रात
सुना मैंने
कि तुम डरने लगे हो कहने में
कि इंसान तो कुछ भी कर सकता है


ज़िन्दगी या मौत
सृजन या विनाश
कुछ भी
हताश से दिखने लगे हो तुम
सबकुछ मसल देने की तुम्हारी हैसियत
दम तोड़ने लगी है अब
सुना है
ब्रम्हांड की सबसे ताकतवर प्रजाति
अस्तित्त्व का सवाल लिए
हाथ जोड़कर खड़ी है
कुदरत के सामने
तो सुनो
कुदरत का साँस लेते रहना ही है
तुम्हारे अस्तित्त्व की एकमात्र शर्त।
                      -अमृत उपाध्याय


Monday, October 3, 2016

बुराड़ी वाली लड़की और मर्द...


                                                       ----अमृत उपाध्याय
   (1)
उस लड़की को,
किसी सिरफिरे ने चाकू मारा है,
दिनदहाड़े।
वह सड़क पर गिरी है,
बदहवास-सी,
ख़ून में सनी है,उसकी देह,उसके कपड़े।
पलटती जा रही हैं उसकी आँखें,
पर उलट रही आँखों से,
उसने देख ली है भीड़,
मर्दों की।

उसे आस है,
बच जाएगी उसकी जान।
उसने सुनी है इन मर्दों की दहाड़,
उसने देखा है मर्द की आँख का क्रोध,
वो समझती है,
अपने देश के मर्दों की नज़र में,
औरत की इज़्ज़त।

 उसने पढ़ी है,
प्राउड टू बी राजपूत, ब्राह्मण,
प्राउड टू बी इंडियन, बिहारी, गुजराती
वग़ैरह- वग़ैरह वाली पोस्ट।
उसे याद आ रहे हैं,
मर्दों की ज़ुबानी सुने,
बड़वारिगी वाले किस्से।
उसे पता है पृथ्वीराज औऱ महाराणा प्रताप के बारे में,
उसने सुना है अर्जुन ,भीम और कृष्ण के बारे में,
वो राम के नाम पर क़त्लेआम को तैयार मर्दों को जानती है।
 नसें फड़फड़ाते मर्दों को,
भुजा से मसलने वालों को पढ़ा है उसने।
उसने तस्वीरें देखी हैं,
गाय चुराने वालों को पीट-पीट कर मार डालने वाली।
उसे याद है स्टेशन पर लिट्टी चुराने वाले की पिटाई,
पीटने वाले राहगीरों का लाल सुर्ख़ चेहरा भी।
वो मिली है दंगा के समय
गर्दन उतारने की ख़्वाहिश रखने वालों से,
वो जानती है गौरवमयी इतिहास पर,
जान न्योंछावर करने को तैयार मर्दों को।
वो जानती है युद्ध के इंतजार में बैठे मर्दों को,
उसे पता है कश्मीर के लिए लहू बहा सकने वालों का डेरा।
उसे भरोसा है अपने देश के मर्दों पर,
बच जाएगी उसकी जान।
भीड़ में से बढ़ेगा कोई आगे,
देगा चार हाथ-- उस सिरफिरे को
चारों  तरफ से घिर जाएगा वो हत्यारा।
 उसे आस है।
      (2)
 उस सिरफिरे के हाथ में चाकू है,
वो बेचैन है, पागल-सा
लड़की की देह के इर्द-गिर्द,
तिलमिलाया सा मंडरा रहा है,
एक घेरा बना चुका है वो।
घेरे के पार खड़े हैं हज़ारों मर्द,
घेरे के पास रूकती जा रही हैं गाड़ियाँ.
थम जा रहे हैं गुज़र रहे मर्दों के क़दम।
बढ़ती जा रही है,
उचक-उचक कर देखने वालों की भीड़।
वो फिर दौड़ा है लड़की की तरफ,
कोई मर्द नहीं आ रहा आगे,
कोई मर्द दहाड़ा नहीं अबतक,
कोई नहीं रोक रहा सनकी को,
हत्यारा उतार देता है चाकू का अगला वार पेट में,
अंतड़ियाँ कट गईं हैं लड़की की,
वो चीखी है बहुत तेज़,
आसमान का कलेजा फाड़ देने वाली है उसकी चीख,
कुछ क़दम पीछे हट गई है मर्दों की जमात,
आँखें तेज़ी से घूम रही हैं उसकी,
धुँधली होती जा रही है मर्दों की भीड़।


     (3)
शून्य में धँस रही है वो,
दिमाग़ में उतर रही हैं कुछ और यादें,
याद आ रही है उसे ,
औरतों की इज़्ज़त करने वालों के मुँह से झरती
 माँ-बहन की गालियाँ,
याद आ रही है उसे,
 अपनी छाती पर टिकी उस अधेड़ की निगाह,
याद है उसे बस, ट्रेन, सड़क, मुहल्ले-टोले में,
 रोज़ आँखों से देह चीरते मर्द।
याद आ रही है उसे,
निर्भया ,
उसका जघन्य बलात्कार,
दर्दनाक मौत।
जेहन में नाच रही है सुखनी की लाश,
ऑनर किलिंग वाली रिपोर्ट।
दहेज की आग में जलाई गई सहेली,
तकरीबन राख बन कर लौटी थी उसकी देह।

याद आ रही उसे गाँव वाली अम्माँ,
जिनके पहनने ओढ़ने, बोलने-चालने
और सोचने तक पर जड़ा था ताला।
जेहन में घूमती जा रही है औरतों की भीड़,
एक-दो,सौ-पचास, हजार- दो हजार नहीं
लाखों करोड़ों औरतें ,
जो चलती फिरती लाशें भर हैं अब।
मन में कौंध रहा है सवाल,
क्या उन्हें भी घेरकर खड़े थे मर्द?

(4)
दम तोड़ने लगी है वो,
टूट रही है आस।
उसकी आँखें बोझिल हो रही हैं,
साफ-साफ नहीं दिखता अब कुछ,
हत्यारा, भीड़ में शामिल मर्द-सा दिखता है,
सारे मर्द हत्यारे-सा दिखते हैं।
उसे महसूस हो रहा है.
चाकुओं से गोद रहा है वो उसका शरीर,
सड़क पर पसर रहा है गाढ़ा खून,
माँस के लोथड़े में तब्दील हो रही है उसकी देह।
याद आ रही है उसे अपनी माँ,
सुबह नाश्ता न कर कैसे भागी थी वो,
माँ नाराज़ थी आज।
घूम रहा है दिमाग़ में पिता का चेहरा,
रात-बिरात घर लौटने पर सूख जाता था उनका कलेजा,
रोज बस स्टैंड तक बेटी को छोड़ने की ज़िद्द,
आज नहीं आने दिया था उसने पिता को साथ ।
याद आ रही है उसे अपने भाई की शरारतें,
आज उसने छिपा दिया था बैग ,
शाम को पिज्जा खिलाने की शर्त पर दिया था वापस।


डूबती जा रही है आँखों की रोशनी,
शांत हो रहा है कान में कोलाहल,
गड्डमड्ड हो रही हैं आवाज़ें,
मिमियाती सी आने लगी है मर्दों की आवाज़,
अंतिम बार पड़ी है कान में कोई आवाज़,
काश कोई इंसान होता यहाँ,
तो बच गई होती
बुराड़ी वाली लड़की।

(दिल्ली के बुराड़ी हत्याकांड के सदमे में.....)