Friday, December 31, 2010

नए साल की सुबह...(संस्मरण)

( ये संस्मरण मैंने कुछ महीने पहले लिखा था...यादों की कसक से हार कर और हिम्मत कर....लंबा संस्मरण होने की वजह से मैं इसे जारी करने में हिचकता रहा..लेकिन आज जबकि पापा की कही बातें कानों से टकरा रही हैं..नये साल की शुरूआत नई उम्मीदों और नए संकल्पों के नाम करने से पहले मैं उन यादों में समा जाने की कोशिश कर रहा हूं..,.,सिर्फ एक बेटे के तौर पर ही नहीं बल्कि एक कथाकार,पत्रकार, रंगकर्मी और समाज का अहम हिस्सा रह चुके शख्सियत से जुड़ाव के बूते जो महसूस किया,क्रमवार  जारी कर रहा हूं....नए साल पर)



मैं पापा के तौर पर ही जान सका उन्हें...रामेश्वर उपाध्याय किस शख्सियत का नाम है, ये समझने का मौका नहीं मिला शायद..बहुत छोटा था मैं, कहने को उंगुलियां पकड़नी सीख ली थी लेकिन दरअसल उनकी उंगुलियों के स्पर्श के भाव और गहराई को समझने का दौर था, जिस वक्त पापा हमसे दूर चले गए...इसलिए मैं पापा के बारे में ही कुछ लिख सकूंगा..क्योंकि रामेश्वर उपाध्याय के बारे में लिखने की सोच रहा हूं पिछले तीन दिनों से लेकिन शब्द साथ देने को तैयार नहीं है....तस्वीरें जेहन में बिल्कुल ताजा हैं...मैं महसूस कर सकता हूं...ठंड के दिनों में सुबह साढ़े चार बजे का वक्त हुआ करता था जब पापा हमें मॉर्निंग वॉक के लिए उठाते थे..फिर हमसभी रमना मैदान जाते थे टहलने...मैं साइकिल भी चला लेता था वहीं और कभी क्रिकेट खेलता था...छोटा था लेकिन मैं जब खेलता या साइकिल चलाता तो पापा के चेहरे पर खुशी को उस वक्त भी महसूस कर सकता था, हां समझ शायद नहीं थी...आज समझ पाता हूं, ये उस कसक के खिलाफ जीत की खुशी थी जो बचपन से पापा ने महसूस किया होगा...पापा टहलते वक्त तेज कदमों से चलते थे....हरे घास पर..मुझे याद है अक्सर लौटते वक्त कचरा उठाते बच्चों को देखकर उनकी रफ्तार धीमी पड़ती थी..फिर वो हमें दिखाते थे--'ये तुम्हारे ही जैसे बच्चे हैं...लेकिन इन्हें भूख से लड़ने के लिए कचरा चुनना पड़ता है..कचरे में मिले प्लास्टिक और शीशे की बोतलों को बेचकर ये चवन्नी की कमाई करेंगे और तब जाकर आज सुबह की भूख मारने का जुगाड़ हो सकेगा..ये बातें इसलिए नहीं थी कि हमें उनपर दया आए...बल्कि कई दफे सुनने के बाद इन बातों ने तय कर दिया था कि ये लोग जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं..स्ट्रगल फॉर सरवाइवल....वक्त बीता...मुझे क्या पता था कि जिस इंसान की उंगुलियां पकड़कर मैंने चलना सीखा वो एक बेहद दूरदर्शी सोच वाला इंसान है....एक ऐसी शख्सियत जिसकी अपनी नींव उनकी खुद की रखी हुई थी...और हमसे कही गई हर बात का जिंदगी भर साथ देने वाला अर्थ होता था। एक दिन गोला गया था मैं सब्जी लाने, शायद ये दूसरी या तीसरी दफा होगा जब मैं सब्जी लाने के लिए गया हूं..अक्सर भैया जाते थे...गोला पहुंचा तो मेरी क्लास का एक लड़का साग बेचते हुए दिख गया था...मैंने उसे देखा और बिना सब्जी लिए घर की तरफ भागा...आंखें डबडबाई हुईं थीं...शाम का वक्त था, पापा छत परबैठे हुए थे....मैं सीधा छत पर पहुंचा था और पापा ने देखते ही पूछा था क्या हुआ बेटा...मैं फफक कर रो पड़ा था..


मीसा के तहत नजरबंदी के बाद की तस्वीर
 .शायद जिंदगी की ऐसी हकीकत को देखने का पहला मौका था...पापा ने मुझे समझाया...उन बातों ने उस दिन कचरा उठाने वालों से लेकर सब्जी बेचने वाले अपने दोस्त तक की तस्वीर का मर्म समझा दिया था.और उस दिन अपने साथ पढ़ने वाले उस लड़के के लिए जो सम्मान जागा वही नींव शायद पापा रखना चाहते थे...सुबह टहल कर हम वापस आते तो चाय होती..हाफ कप चाय पीते थे पापा..कड़क..बोलते भी थे मम्मी से...मनुआ हाफ कप चाय बनाओ.थोड़ा कड़क...मनु बोलते थे पापा मां को..और अक्सर मनुआ...गर्मी की सुबह हो या फिर ठंड की...सुबह पापा बागवानी जरूर किया करते थे..छत पर उन्होंने करीब 200 पौधे लगाए थे..जिनमें अधिकतर थे गुलाब..गुलाब की नयी कलियां जिस दिन खिलती थीं उस दिन की सादगी सबसे ज्यादा होती थी शायद उनके लिए...सबको आवाज देकर बुलाते थे छत पर से...और उनकी बातों में इतनी गहराई होती थी कि उस कली के खिलने की खुशी को हम महसूस कर लेते थे...जिंदगी भर याद रह जानेवाली दूसरी सीख हमें छत पर खिले कलियों को देखते वक्त ही मिली...पापा बताते थे कली से गुलाब बनने तक का सफर फिर गुलाब की खुबसूरती का चरम और वक्त के साथ उसका मुरझा जाना, हां और ये भी कि अगर किसी ने इसे तोड़ दिया तो उम्र के पहले की मौत का दर्द होगा..उसे भी और उसे देखकर खुश होनेवालों को भी..लेकिन उसके बाद ये भी कि यही संघर्ष जीवन है...। पापा की इस बात का साथ बेहद मजबूत रहा....बहुत मजबूत...। जिस पुराने मकान में रहते थे हम वहां दो कबूतर रहा करते थे मेरे कमरे के ऊपर एक वेंटीलेटर के लिए जगह छोड़ा गया था वहीं उन्होंने घोंसला बनाया था....दिन भर शांत से बैठे रहते..
पत्रकारिता के दौरान की तस्वीर
एक उड़ता फिर कोई डंठी लेकर चला आता..फिर उनके अंडे हुए पांच...और बिल्ली की नजरें गड़ गईं...एक अंडा फूट गया गिरकर, बच्चे हुए तो दो मर गए...पता नहीं कैसे..हमारा मन उदास था और हम तीनों भाई बहन को खाने तक मन नहीं हो रहा था...उस दिन पापा ने फिर समझाया था जिंदगी की लड़ाई को देखने का नजरिया कैसा हो...ये सब मिलकर अब समझ में आती है..महसूस होती हैं..पापा की बातें..संघर्ष करने वालों की जीत होती है....ये सबक जिसने हमारे मन में बीज डाला कि कमजोर लोग जिंदगी से भागते हैं..जिसकी बदौलत हमने पापा की हत्या के बाद आत्महत्या करने की नहीं सोची...जिसकी बदौलत हमने लड़ने की ठानी...और मझधार में तैरने की कोशिश की...
(क्रमश:)

Monday, November 22, 2010

दर्द का हद से गुजरना है दवा बन जाना



(सुरेंद्र स्निग्ध के साथ ये इंटरव्यू मैंने अक्टूबर 2005 में की थी..इस इंटरव्यू की कई बातें अपील करती हैं..पांच साल बाद भी बिहार में बातों का मिजाज तो बदला है लेकिन स्थितियां कमोबेश पुरानी ही है...लिहाजा इस इंटरव्यू को सार्थकता बरकरार होने की वजह से इसे जारी कर रहा हूं...हो सके तो पढ़िए..)

सुरेंद्र स्निग्ध के साथ अमृत उपाध्याय की बातचीत पर आधारित...(13 अक्टूबर 2005 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

क्या सत्ता का पुराना समीकरण टूट रहा है? अगर ऐसा है तो इसके मायने क्या होंगे?

बिहार के राजनीतिक मन-मिजाज को दिल्ली नहीं समझ पा रही है। और तो और समाज का चौथा स्तंभ समझा जाने वाला मीडिया भी बिहार के मन-मिजाज को समझने में पूरी तरह असफल है। एयर कंडीशन स्टूडियो और चैंबर में बैठ कर और कुछ मनगढ़ंत सैंपल के आधार पर राजनीतिक विश्लेषण का तरीका अत्यंत हास्यास्पद है, अवैज्ञानिक तो है ही। प्राचीन समय से ही बिहार का राजनीतिक मन-मिजाज एकदम अलग रहा है। जब पूरे विश्व में राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र की सुगबुगाहट भी नहीं थी, तब वैशाली का गणराज्य, लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में पूरे विश्व को एक नयी दिशा दिखा रहा था।भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई हो या सत्ता में पिछड़ों की भागीदारी का सवाल या ब्राम्हणवाद के खिलाफ लड़ाई का मजबूत गढ़ उत्तर बिहार या उसके पहले भी बौद्धों या जैनियों के द्वारा ब्राम्हणवाद के खिलाफ पूरे विश्व के परिदृश्य में बिहार को केंद्र के रूप में खड़ा किया गया था। बिहार हमेशा ही राजनीति की मुख्यधारा से अलग अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। इसके समाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक कारण हैं। दरअसल सत्ता का स्वरूप जो केंद्र में रहा, वह बिहार में कभी रहा ही नहीं। सोशलिस्टों का भूमि हड़प आंदोलन हो या जय प्रकाश के नेतृत्व में छात्र आंदोलन। इसके पहले भी एकीकृत बिहार का चाहे मुंडाओं का आंदोलन हो या मुसहरी के अत्यंत पिछड़े समुदायों का आंदोलन। सत्ता का वह रूप जो केंद्र के द्वारा निर्धारित था बिहार ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। जाहिर है, सत्ता का नये-नये समीकरण बिहार में बनते और बिगड़ते रहे हैं। अगर आपका आशय लालू यादव की सत्ता से है, तो मेरा निवेदन है कि लालू यादव नये रूप में फिर आ रहे हैं। भले ही उसका नेतृत्व किन्हीं के हाथों में हो, भीतर लालू ही होंगे। क्योंकि लालू अब सिर्फ एक नाम नहीं हैं, वे प्रवृत्ति हैं, नीतीश कुमार हों या रामविलास पासवान, ये सारे लालू के ही अलग-अलग चेहरे हैं।

बिहार की बदहाली, शासनहीनता और अराजकता का परिणाम क्या हुआ? इसके लिए क्या लालू जिम्मेवार हैं? क्या अब बिहार सही दिशा में जाएगा..

आपका दूसरा सवाल बिहार के बाहर, बिहार की छवि को बदनाम करने के लिए एक सोची समझी साजिश के तहत उठाया गया सवाल है। बिहार इस ग्लोब से बाहर का कोई मानचित्र नहीं है। पूरे वैश्विक परिदृश्य पर बद्हाली, पिछड़ापन, अराजकता इन तमाम स्थितियों के नाम पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के द्वारा उठाए गए नाम हैं। परदे के पीछे गैंगमास्टर की भूमिका में हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और अमेरिकी सम्राज्यवाद, जो मुखौटा लगा कर इसके पीछे खड़ा है। बिहार अकेला नहीं है, सम्पूर्ण हिंदी पट्टी इसी बद्हाली जी रहा है। तमाम ऐसे प्रदेश हैं जहां का जीवन कृषि आधारित है, पिछड़ा है। सत्ता की लूट-खसोट में शामिल सभी लोग शातिर अपराधी हैं। कोई अपहरण करता है, कोई अपहरण करवाता है, लेकिन आम जीवन कितना सुरक्षित है? कभी इन परिस्थितियों का भी खुलासा किया जाना चाहिए। ऊपर-ऊपर दिखने वाला शांत जल भीतर से सुनामी को समेटे हुए होता है। बिहार को बद्नाम करने के षड्यंत्र का भी पर्दाफाश होना चाहिए। फिर बिहार की जिस बद्हाली की आप बात कर रहे हैं, उसके लिए किसी का भी दस-पन्द्रह वर्षों का शासन काल दोषी नहीं हो सकता। भारत की आजादी के बाद यहां की राजसत्ता पर बदले हुए रूपों में जो लोग काबिज हुए हैं, सारा कुछ उन्हीं के द्वारा खेला जाने वाला नाटक है। आप बार-बार सत्ता की बात कर रहे हैं। हमलोग तो सपने देखने वाले उस जमात के लोग हैं, जो व्यवस्था परिवर्तन की बात सोचते हैं। गद्दी से जॉन के चले जाने के बाद जगदीश के बैठने से कोई अंतर नहीं हो जाता। जबतक मेहनतकश मजदूरों और किसानों या श्रमशील जनता के हाथों में सत्ता की चाभी नहीं होगी, व्यवस्था नहीं बदलेगी। बदलते रहिए लालू की जगह नीतीश, नीतीश की जगह रामविलास या कि सूरजभान या कि मुन्ना शुक्ला या पप्पू यादव, ये नाम अलग-अलग हैं, लेकिन हैं एक ही व्यक्ति का। और सत्ता पर काबिज होगा यही व्यक्ति।

क्या दलित-अतिपिछड़े बिहार में किसी तीसरे धुव्र के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं? यदि हां, तो ये धुव्र कितना ताकतवर होगा?

आपका यह प्रश्न दरअसल अगले प्रश्न के सपनों के साथ जुड़ा हुआ है। दलित के पर्याय अगर रामविलास हैं, अगर पिछड़ों के पर्याय लालू यादव और नीतीश हैं और अल्पसंख्यकों के पर्याय यदि शहनवाज हुसैन या शहाबुद्दीन हैं तो विश्वास कीजिए की बिहार रसातल की ओर जा रहा है। तीसरे विकल्प की कुंजी वामपंथी सोच वाली राजनीति के पास है लेकिन यह कैसा वामपंथ जो आधा रामविलास के साथ जुड़ा हुआ हो और आधा लालू यादव के साथ। नक्सलबाड़ी आंदोलनों से जुड़े हुए राजनीतिक कार्यकर्ता इतने धड़ों में बंटे हुए हैं, कि समझ में नहीं आता कि तीसरा विकल्प बनाएगा कौन। लेकिन आश्वस्त रहिए अराजकताएं जितनी बढ़ेंगी जनता अपना रास्ता तलाशेगी। जनता महान होती है, आप कुछ क्षण के लिए तो उन्हें जरूर ठग सकते हैं, लेकिन अंधेरे में बहुत दिनों तक भटका नहीं सकते। दर्द जब हद से गुजरेगा तो वह दवा जरूर बनेगा- ‘दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना’

लालू का तिलिस्म टूटने की स्थिति में बिहार में बाजार और मध्यवर्ग की क्या स्थिति होगी?

लालू का तिलिस्म टूटा नहीं है। बिहार के पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों ने लालू में अपने सपनों को देखा। पहली बार बिहार की मध्यवर्गीय शक्तियों को अपनी सही शक्ति का एहसास कराया था लालू ने। बिहार में वर्षों से जड़ जमायी हुई सवर्णवादी मानसिकता और सवर्णों,जमींदारों, पुरोहित-पंडितों के द्वारा इन मध्यवर्ती जातियों का समाजिक और सांस्कृतिक शोषण जितना हुआ था, लालू यादव में उसकी मुक्ति का सपना देखा था। लेकिन जब लालू यादव खुद ही सामंती मन-मिजाज में परिवर्तित हो गए। तंत्र-मंत्र और ढकोसलों में लिप्त हो गए। ब्राम्हणवाद का विरोध करते हुए जिस तरह से स्वयं ब्राम्हणवाद का पर्याय हो गए, बिहार के इस बड़े जनसमुदाय की जन-अकांक्षाओं की आकस्मकि मृत्यु हो गई। इन स्थितियों के बाद लालू यादव का तिलिस्म टूटा तो जरूर, लेकिन नए-नए रूपों में ही तिलिस्म कभी नीतीश कुमार के रूप में तो कभी रामविलास पासवान के रूप में खड़े होते रहे या हो रहे हैं, उनके सामने। लेकिन लोग यह भी जान रहे हैं कि नीतीश कुमार के पीछे किस तरह की शक्ति और मानसिकता खड़ी है। फासीवाद, सांप्रदायिक और जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वालों को संरक्षण देने वाले ये नेता लालू के बदले सत्ता में बैठ तो जरूर जा सकते हैं लेकिन सही विकल्प कभी नहीं दे सकते। मध्यवर्ग और मध्यवर्ती जातियां ऐसे चौराहों पर खड़े हैं, जहां से विकल्प का कोई रास्ता नहीं खुलता।

बिहार में अपराधीकरण के मसले पर क्या स्थिति बनेगी?

अपराध की प्रवृत्ति, पूंजीवाद की उपज है। पूंजीवाद ने बाजार में जिस तरह के सुनहले सपनों की दुकानें सजा रखी हैं और हर किसी में इन सपनों को खरीदने के लिए जिस तरह की बेचैनी पैदा कर दी है। अपराधीकरण इसी बेचैनी का पर्याय है और यह अपराधीकरण सिर्फ बिहार की समस्या नहीं है। बन्धु, यह है ग्लोबल फेनोमेनन। दुख, पीड़ा, परेशानी, दर्द और आंसुओं की भी मार्केटिंग कर रहा है ये पूंजीवाद। हत्याओं की मार्केटिंग हो रही है। अब आप कह रहे हैं कि कैसा होगा अपराधीकरण भविष्य में। तो सिर्फ यही निवेदन किया जा सकता है कि भविष्य में भी ऐसे ही अपराध होंगे।

बिहार नक्सलवाद का मजबूत गढ़ रहा है। लालू को शासक वर्ग की ओर से यहां नक्सलियों के जवाब के रूप में लाया गया था। अब उसके कमजोर होने की स्थिति में नक्सलवाद की क्या स्थिति होगी?

बिहार समाजवादी आंदोलनों का गढ़ रहा है। बिहार में नक्सलबाड़ी आंदोलन को आधारभूमि देने में इसी वर्ण संघर्ष ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। जहां सामंतों और श्रमिकों के बीच(खेतिहर मजदूर सहित) संघर्ष जैसी पृष्ठभूमि रही है। नक्सलबाड़ी आंदोलन वहां उसी रूप में फैला है। लालू यादव को नक्सलियों के खिलाफ खड़ा किया गया था, मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं। मैंने पहले भी कहा है कि लालू यादव बिहार के वृहत्तर पिछड़ी जातियों के सपनों का नाम था। लालू यादव ने युगों से उपेक्षित पिछड़े वर्ग को स्वाभिमान दिया है, यही स्वाभिमान इन जातियों में राजनीतिक भूख के रूप में बदल गया। नक्सलबाड़ी आंदोलनों ने अगर विवेक से काम लिया होता और आधारक्षेत्रों के संघर्षों को विकसित किया होता तो निश्चित रूप से इसके द्वारा लगाई गई फसल या फल को लालू नहीं काट पाते।

पूंजी निवेश से वंचित और आर्थिक विकास की बाजारवादी प्रक्रिया से बहिष्कृत बिहार का क्या भविष्य होगा?

भगौलिक और प्राकृतिक रूप से अविभाजित बिहार धन-धान्य से परिपूर्ण था। झारखंड राज्य अलग होने के बाद शासक वर्ग के हाथों में सोने की थाली मिल गई है। बिहार का अस्सी प्रतिशत राजस्व झारखंड के इलाकों से प्राप्त होता था। शेष बिहार पूरी तरह कृषि आधारित है, और कृषि को आजतक उद्योग का दर्जा हम नहीं दे पाए हैं। शेष बिहार की भगौलिक संरचना देखें, हर साल पूरा इलाका बाढ़ और सूखे से प्रभावित रहा है। जिन इलाकों में नगदी फसलें तैयार हो रही हैं वहां के उद्योग-धंधे वर्षों से बंद हैं, यहां की चीनी मीलें सिर्फ पन्द्रह वर्षों से बंद नहीं हैं, यहां की जूट मील उवर्रक तथा तेलशोधक कारखानें इसलिए बंद नहीं हैं कि बिहार में कोई वैकल्पिक आंतरिक संरचना नहीं बदल रही। गौर कीजिए ये फैक्ट्रियां लगी हैं बिहार में और इसका मुख्यालय है कलकत्ता में। लौह अयस्क निकलता था चाईबासा में, प्रोसेस्ड होता था कलकत्ता में।

नया बिहार बनाने के लिए जरूरत है सिर्फ कल्पनाशीलता की।हर साल आने वाली बाढ़ को नियंत्रित कर उत्पादन की दूसरी दिशाओं में उनकी शक्तियों को लगाया जा सकता है। बिहार में प्रतिभा और श्रम दोनों ही कच्चे माल के रूप में प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हैं, आवश्यकता है उत्पादन के रूप में उन्हें ढाल देने की।
                                                                             

Saturday, October 16, 2010

बीच सफर में....

ये सड़कें,


बिल्कुल सपाट सी तो नहीं,

लेकिन इतनी

कि चिढ़ा सकें गांव और कस्बों से

मोटरी बांध कर आए लोगों को,

और लजा जाएं हमारे जैसे चंद लोग।
चंद क्यों, पूरी जमात ही

जो रोटी की तलाश में,

समा गए बड़े शहर में..

जिन्हें सुकून नहीं मिलता सोचकर,

कि भागते दौड़ते लोगों के पीछे लगकर,

सही तो किया न...

लजा तो मैं भी जाता हूं, रोज,

उनकी तरह,

जो नहीं जानते तहजीब

कि, सोये हुए इंसान की खुली आंखें

और खुली आंखों वाला सो रहा इंसान

इस सड़क की जरूरत हैं,

वाज़िब जरूरत, शायद।
                                             ---अमृत उपाध्याय

Thursday, September 16, 2010

जा रहा हूं।

मैं गाँव से जा रहा हूँ


कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए

मैं गाँव से जा रहा हूँ

अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

खेत चुप हैं हवा ख़ामोश,
धरती से आसमान तक तना है मौन,
मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं मेरे पुरखे... मेरे पित्तर,
उन्हें मिल गई है मेरी पराजय,
मेरे जाने की ख़बर

मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ । 
                                   --निलय उपाध्याय
(निलय उपाध्याय की इस कविता को पिछले कई दिनों से तलाश रहा था...फेसबुक पर एक बार फिर ये कविता पढ़ने को मिली...)

Sunday, August 22, 2010

बाबा...

झुर्रा गई बाबा के देह की चमड़ी,
उनकी हथेली का वो हिस्सा,
जिसके बूते उठाते थे वो,
दाल भात का कौर,
और अक्सर टकराते थे
मेरे होंठ ।
नेनुआ में बूंट की महक 
और कांख से निकलती
पसीने की गंध,
समाती नहीं है अब भीतर,
चुनौती देती है,
कि खोज लो कहीं
तो जानूं।


सात बुर्बकों वाला पंडित भी
गुम हो गया,
वो पाड़ा जिसने पीया था,
सात भैंसों की थान का दूध
और घी,
और टकरा गया था बाघ से,
और उजले छड़ी वाली वो परी
जो मिल जाए तो
लौट आएगा बचपन..
कि कांधा चढ़कर,
फिर घुमाउंगा मैं
बाबा की मूड़ी,
नन्ही उंगुलियों से
दिखाउंगा रास्ता और थकने पर
टेक दूंगा अपनी टुड्ढी,
कि फिर बढ़ जाएंगे बाबा के कदम
वाह लाल्ला जी, वाह लाल्ला जी
करते हुए, सरैयां बाजार
ललकी मिठाई के दुकान की ओर
और फिर सुनूंगा खप्पर वाले
अपने आंगन में खुले आसमान तले
रेडियो की खर्र खर्र और
काकी का चौपाल
और बाबा के कंबल में घुसकर
पूछवाउंगा सवाल कि
कहां हूं मैं..
कि फिर आएगी गहरी नींद,
जो नहीं मयस्सर होती अब
और उठ उठ कर
महसूस करूंगा,
बाबा के देह की छुअन।
सुबह गमछी में नहाएंगे जब
तो लड़ाउंगा डागा (सिर से सिर टकराना)
कइया वाले बोरिंग पर,
और गिरेंगी बारिश की बूंदें,
तो झुर्राई चमड़ियों में समा जाउंगा मैं
और मिल जाएगा बाबा को
उनका लल्ला जी.....
मुझे मेरा बचपन।
                                 ---अमृत उपाध्याय

Sunday, August 15, 2010

आज़ादी की कहानी, आम आदमी की ज़ुबानी..

(महुआ न्यूज़ पर आज़ादी के दिन प्रसारित स्पेशल बुलेटिन का एक हिस्सा....)

मैं आम आदमी हूं... आजाद..आजाद देश और आजाद अवाम का एक हिस्सा हूं..मैं आजाद हूं...अंग्रेजों के खिलाफ मेरे पुरखों के खून जिस मिट्टी पर पसरे थे मैं उसी मिट्टी का एक लाल हूं..जो महसूस करता हूं आजादी को अपनी रगों में...इस आजादी का फक्र मुझे हर दिन सुबह की लालिमा, दोपहर की तल्खी और सांझ के धूसर सौंदर्य में महसूस होता है..लेकिन फिर भी कहीं उदास हूं मैं...जब किसी गांव में नंगा कर दी गई सुखनी डायन बताकर और भीड़ टूट पड़ी उस पर भूखे भेड़िये की तरह, जब देह में धंस रही नजरों की वजह से घर के बाहर जाकर नहीं पढ़ सकी मुन्नी, जब अनाज उपजाने वाले किसान के हाथ में मुट्ठी भर गेहूं समेट सकने से ज्यादा आसान फांसी लगा लेना होता है, जब भूख से मर गया था कानू डोम और सरकारी नुमाइंदों ने नहीं मानी भूख को मौत की वजह...जब नक्सलियों और पुलिस के बीच हर रोज खेला जाता है एक दूसरे को लाशों में तब्दील करने का खेल.....जब प्रांतवाद के नाम पर सड़कों पर रोजी रोटी चलाने वालों पर बरसाईं जाती हैं लाठियां..जब रोज अपने आशियाना को डूबते देख रहे लोगों की बेचैनी पर गाढ़ा होता जाता है सियासत का रंग और सियासतदां के घर के कमरे में फैली रूम फ्रेशनर की खुशबू में दब जाती हैं लाशों से आती बू...तो दरक जाता है मेरा
कलेजा...क्योंकि मैं आम आदमी हूं....आजादी का रंगीन चश्मा पहने आम आदमी...आजादी के आइने में देश के युवाओं के चेहरों पर झुर्रियां और जवान शरीर पर बेड़ियां देख के रोता हूं मैं...और तब लगता है आजादी के इस रंगीन चश्मे का रंग काला पड़ गया और छा गया आंखों के सामने अंधेरा...फिर तलाशने लगता हूं मैं आजादी के मायने...तब लगता है मुझे कि घर में तकिया के भीतर मुंह छिपाकर रो लेना ही आजादी है तो हैं हम आजाद,नहीं तो मुंहतक्की करनी पड़ेगी जनाब...आजादी को महसूस करने के लिए...लेकिन फिर अचानक फड़क जाती हैं मेरी देह..कुछ लोग हैं जो लड़ रहे हैं नंगई के खिलाफ...कुछ तैयार बैठे हैं इस लड़ाई का कंधा बनने के लिए...ये लोग अंदरूनी तौर पर आजादी को खा रही ताकतों से बचाने की फिराक में लहूलुहान कर रहे हैं अपनी देह...कुछ लोग जिंदा हैं और जगे हुए हैं..ये लोग हैं आम आदमी बिल्कुल मेरी तरह..आपकी तरह... यही आस काले चश्मे का रंग फिर रंगीन कर देती है..और फक्र होता है कहने में कि मैं....आम आदमी हूं और मैं आजाद हूं...
                                                                                                                                   ---अमृत उपाध्याय
((इस इकरारनामे को जारी रखते हुए राकेश पाठक की कलम ने बयां किया है ...आज़ादी के दिन इस आम आदमी की अकुलाहट...))
आज न जाने क्यूं ऐसी कोई भी तस्वीर देखने का जी नहीं करता जिसमें परवाज़ की कोई गुंजाइश न दिखे। हर आखिर खास जो है आज का दिन। ज़रा महसूस करिए न अपने आसपास आज के धड़कते इस दिन को। सब वैसे ही है मंदिर की घंटी, अंगीठी में धधकती आग, चाय के गिलास में गिरने का सलीका। हमारी आपकी ज़िंदगी की भागम-भाग, उलझन सब। लेकिन फिर भी दिन खास है।
आज़ाद हवा की खुशबू कहीं अंदर तक उतरती है। कहीं नहीं रुकती थोड़ी देर थमती है फिर निकल चलती है। रंग आजादी के कई हैं...ज़ाएके भी तो हैं...हमारे अपने जाएके...आम आदमी के ज़ाएके...सबके पास अपना हुनर है आज़ादी को महसूस करने का। इसके ज़ाएके को चखने का।
फिर आज़ादी दरस तो ऐसे ही देती है दिन उगने के साथ...उसके बुझने के साथ। इस एहसास के साथ सारा आसमान हमारा न सही तो अपने वतन के ऊपर ठहरा आसमां हमारा है। इसकी पीली सुनहरी धूप हमारे ज़िस्म की हरारत में घुली है कहीं। तो आइए एक चाय के साथ हो जाए हमारी आज़ादी का सेलिब्रेशन....आम आदमी की तरह।
                                                                                                        ----राकेश पाठक

Thursday, August 12, 2010

चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...

(निखिल आनंद गिरि  ने अपने जन्मदिन के मौके पर ये कविता 'बैठक' पर जारी की थी..कविता को आप भी महसूस कर सकें इसलिए 'बैठक' से साभार लेकर इसे जारी कर रहा हूं...जरूर पढ़िए)

तितर-बितर तारों के दम पर,

चमचम करता होगा रात का लश्कर,
चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...

एक दो कमरों का घर रहा होगा,
एक दरवाज़ा जिसकी सांकल अटकती होगी,
अधखुले दरवाज़े के बाहर घूमते होंगे पिता
लंबे-लंबे क़दमों से....

हो सकता है पिता न भी हों,
गए हों किसी रोज़मर्रा के काम से
नौकरी करने....
छोड़ गए हों मां को किसी की देखरेख में...
दरवाज़ा फिर भी अधखुला ही होगा...

मां तड़पती होगी बिस्तर पर,
एक बुढ़िया बैठी होगी कलाइयां भींचे....
बाहर खड़ा आदमी चौंकता होगा,
मां की हर चीख पर...

यूं पैदा हुए हम,
जलते गोएठे की गंध में...
यूं खोली आंखे हमने
अमावस की गोद में...

नींद में होगी दीदी,
नींद में होगा भईया..
रतजगा कर रही होगी मां,
मेरे साथ.....चुपचाप।।
चमचम करती होगी रात।।।


नहीं छपा होगा,
मेरे जन्म का प्रमाण पत्र...
नहीं लिए होंगे नर्स ने सौ-दो सौ,
पिता जब अगली सुबह लौटे होंगे घर,
पसीने से तर-बतर,
मुस्कुराएं होंगे मां को देखकर,
मुझे देखा भी होगा कि नहीं,
पंडित के फेर में,
सतइसे के फेर में....

हमारे घर में नहीं है अलबम,
मेरे सतइसे का,
मुंहजुठी का,
या फिर दीदी के साथ पहले रक्षाबंधन का....
फोटो खिंचाने का सुख पता नहीं था मां-बाप को,
मां को जन्मतिथि भी नहीं मालूम अपनी,
मां को नहीं मालूम,
कि अमावस की इस रात में,
मैं चूम रहा हूं एक मां-जैसी लड़की को...
उसकी हथेली मेरे कंधे पर है,
उसने पहन रखे है,
अधखुली बांह वाले कपड़े...
दिखती है उसकी बांह,
केहुनी से कांख तक,

एक टैटू भी है,

जो गुदवाया था उसने दिल्ली हाट में,
एक सौ पचास रुपए में,
ठीक उसी जगह,
मेरी बांह पर भी,
बड़े हो गए हैं जन्म वाले टीके के निशान,
मुझे या मां को नहीं मालूम,
टीके के दाम..

--निखिल आनंद गिरि