Monday, January 10, 2011

फिर आ जाना...(संस्मरण का अंतिम हिस्सा)

  (संस्मरण का दूसरा हिस्सा मतलब अंतिम किस्त जारी कर रहा हूं...'फिर आ जाना' पापा की एक कहानी का नाम है....इस संस्मरण के मार्फत मैं भी बस यही कहना चाहता हूं.. पापा बस एक बार....फिर आ जाइए ना.. )

मैं बता रहा था कि पापा सुबह बागवानी करते थे..छत पर खुरपी रखी रहती थी एक...उससे मिट्टी को कोड़ते थे..गोबर का खाद बनाया था उन्होंने....और हां गाय भी थी हमारी एक..काली गाय...प्योर ब्लैक...पापा कहते थे...लछमिनिया गाय हीय...वो हमारे परिवार का एक अहम हिस्सा थी...अब सोच कर हंसी आती है..पापा ने अपने ऑफिस से सटे हुए कमरे की फर्श को तुड़वा दिया था...और वहां कोने में नाद लगवा दिया...रात में ही बगल वाले कमरे के टूटे फर्श पर ईंटे बिछवा दी ताकि गाय का खुर ना फिसले। ऑफिस और कमरे के बीच की दीवार को भी तुड़वा दिया पापा ने...यहां तक कि दो सीढ़ियां भी जो मेन गेट पर थीं...और पापा कचहरी से जब आते थे अमूमन चार बजे तो स्कूटर के पीछे करीब 20 किलो हरियरी लाते थे..जापानी फार्म से..और आते के साथ पहला काम गाय का सानी-पानी....उसके बाद फिर शाम की चाय लेते थे..हम सब एक साथ बैठते थे...मैं दरअसल बैठता नहीं था...मैं पापा में सट जाता था...सबसे छोटा था तीन भाई बहनों में...सबसे बड़े भैया फिर दीदी फिर मैं..मैं पापा के सीने पर पैर रखकर सट जाता था...और कभी अगर मुझे लगता कि बिना पूछे आज सटने पर डांट भी पड़ सकती है तो फिर पूछ लेता था...पापाजी सटने का मन कर रहा है...जिंदगी के बेहतरीन पल थे...पापा जिस कप में चाय पीते थे उसमें अंतिम में थोड़ी चाय छोड़ देते थे...और अंतिम दो घूंट के लिए तो मारामारी थी..कभी मैं पी जाता तो कभी दीदी...हंसी आती है सोच कर एक दफे पापा ने चाय पीने के बाद अंतिम में तंबाकू का धूल झाड़ दिया था प्याले में..और दीदी पी गई गलती से उसे...बस फिर उस दिन लड़ाई का मजबूत सिपहसिलार मैं खुद को महसूस कर रहा था...पापा के व्यक्तित्व को समझना उस उम्र में शायद

मुमकिन नहीं था मेरे लिए लेकिन उनके साथ बीते पलों ने बाद के दौर में उनके व्यक्तित्व को समझने में बहुत मदद की....करीब तीन सालों तक मुझे याद है हमारे घर एक बूढ़ी औरत आया करती थी...अपने रिश्तेदारों से तंग होकर वो मदद के लिए आई थी पापा के साथ...देखने में लगता था नब्बे डिग्री के कोण पर झुकी हुई है....कभी वेश्यावृति के धंधे में उसने जिंदगी गुजारी थी और उम्र के आखिरी दौर में उसके आगे पीछे कोई नहीं था..कुछ रिश्तेदार थे जो उसे तंग करते रहते थे..जब वो आयी थी उस दिन से लेकर पापा की मौत तक उसे किरासिन, अनाज, कपड़ा लत्ता पापा दिया करते थे...कभी-कभार उसकी वजह से घर में तनाव भी हो जाता था...पापा की नजर में बढ़ती उसकी अहमियत को हम पचा नहीं पा रहे थे..हमें लगता था हमारे पापा...मम्मी को लगता था मेरे पति....क्योंकि हम सभी में इतनी समझ नहीं थी कि उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को महसूस कर सकें..उनके नजरिये को समझ सकें...एक बार उस बूढ़ी औरत की तबीयत बेहद खराब हुई थी...मम्मी मुझे लेकर मायके गई थी, भैया थे पापा के साथ और ठीक से याद नहीं शायद दीदी भी घर पर ही थी...लेकिन ये याद है कि जब हम घर लौटे थे उस बूढ़ी औरत की मरणासन्न स्थिति थी..और पापा हमारी आवाज सुनकर भी बाहर नहीं निकले थे...उसे मेरे ही बेड पर लिटाया था और तौलिये से पापा उसके मुंह से लगातार गिर रहे लार को पोछ रहे थे...मैंने आते ही सुना था भैया से बोलते हुए जल्दी जाकर डॉक्टर विकास को बुला लाओ...मुझे उस दिन बड़ी घिन्न लग रही थी..लग रहा था मेरे ही बेड पर पापा ने लिटा दिया है उसे...
फिर सिरप पिलाते, दवाई खिलाते...बाद में पता चला था कि बूढ़ी औरत को कैंसर हो गया था..फर्स्ट स्टेज का...लेकिन वो ठीक हुई...डॉक्टर ने कहा...एक दो साल खींच देगी...पापा बहुत इमोशनल इंसान थे..लेकिन बेहद जिंदादिल..जहां पहुंचते ठहाके लग जाते थे...बूढ़ी औरत जब ठीक हो गई थी, कुछ लोग बैठे थे...पापा के मुंह से निकला...का बूढ़ी..जान त सुखा देले रहू...सबके चेहरों पर मुस्कान बिखरी थी...एक टीम वर्क के तहत हमने बचाया जो था बूढ़ी को...खैर, मुझे अफसोस नहीं है कि मेरे मन में उस वक्त थोड़ा गुस्सा भी आया था और घृणा भी..

पापा के मुंह से कुछ बातें अक्सर निकलती थीं..मेरे जेहन में बिल्कुल तरोताजा हैं वो ठहाके...उनकी बातें..लगता है सिर्फ सोच नहीं रहा मैं, पापा ही बोल रहे हैं आज भी...हूदा के बेटा बेहूदा....मुझे बोलते थे पापा जब सारे लोग मुझे डांटने लगते थे..केस खुलता था मेरे खिलाफ..सारी सुनवाई के बाद पापा बोलते थे..सब केहू मिलके हमार लइकवा के तंग कइले बा....अब एकर का गलती बा हूदा के बेटा बेहूदा जौन ह...और हां कभी कभार तो मैं भांप नहीं पाता था कि पापा गुस्से में हैं या फिर खिंचाई कर रहे हैं...कभी तेज आवाज आती उनकी...छोटूआ...बगल के कमरे में अगर मैं होता था तो पन्द्रह मिनट लग जाते थे डर के मारे पापा के सामने जाने में...एक कदम भारी हो जाता था..उस बीच तीन-चार दफे पापा की आवाज आती थी और साथ में धमकी भी..आईं का हम...बस यही डर रहता था कि पापा के आने से बढ़िया मैं ही हाजिर हो जाउं...पहुंचने पर शिकायतों का पिटारा तो खुलता ही..झूठमूठ का डराने के लिए..डर के मारे सिर नीचे रहता था..नजरें फर्श की तरफ...उसी में पापा की आवाज आती...जाये दे बेटा ई लोग के बूझात नइखे लाजे लागित त लंगटे पैदा भइल रहित बेटा हमार...फिर एक जोरदार ठहाका...फिर मैं पापा को बोलता था हंसने और रोने के मिलेजुले भाव के साथ..।आप भी गंदे हैं...मैं आप पर भी केस कर दूंगा...सबको धमकी देता था मैं केस कर दूंगा...पापा वकील थे शायद इसीलिए...किसी पार्टी फंक्शन में पापा सबको खाने के लिए पूछते थे और बच्चियों को बोलते थे..ना खइलू त मुड़िये काट देम.....। पापा खुशमिजाज थे...
स्पार्ट्कस नाटक के दौरान उजली दाढ़ी और बाल में रामेश्वर उपाध्याय
...तमाम तनावों के बावजूद...तनाव हर पल जिंदगी की कीमत पर होती थी लेकिन उनके ठहाकों में जिंदगी का फलसफा होता था शायद....और हां...किसी फिल्मी डॉयलॉग को सुन कर या फिर कुछ अटपटा सा होते देखकर बोलते थे..वाह बेटा, जन्मल होइब त छिपा बाजल होई....। पापा को लिखते देखने का मौका कभी कभार मिला है लेकिन बहुत कम
..कई बार उनसे लिखने का अनुरोध जब कुछ खास लोग करते थे तो वे लिखते। आरा से निकलने वाले अखबार भोजपत्र के लिए उन्होंने अपने कॉलम को दुबारा लिखना शुरू किया था--फिर बैतलवा उसी डाल पर....। फिर बैतलवा उसी डाल पर दरअसल भोजपुर न्यूज का कॉलम था जो पापा निकालते थे और उसके संपादक थे...प्रेस में मैटर टाइप होता था वो मुझे याद है...मैं भी पहुंच जाता था हमेशा...अपने बियाह का कार्ड छपा कि नहीं ये पूछने के लिए....और रोज पापा और प्रेस स्टॉफ मुझे कोई दूसरा कार्ड दिखाकर भेज देते थे ये बोलकर कि बस नइकी(लड़की) के नाम छपल बाकी बा.....। अखबार छपने की धुंधली लेकिन पुख्ता तस्वीरें मुझे याद आती हैं...पापा का प्रूफ चेक करना...प्रेस स्टॉफ के द्वारा मैटर का बड़ी प्रिंटिंग मशीन में डालना और पन्नों को सेकंडों के अंतर पर हाथ डालकर निकालना...प्रेस में दो मशीनें थीं...एक बड़ी प्रिंटिंग मशीन और दूसरी छोटी....बिजली का बुरा हाल था आरा में....और रात-रात भर प्रेस में काम चलता रहता था...कई बार मैंने देखा है बिजली कट जाने पर पापा को छोटी मशीन को हाथ से चलाते हुए....उनका चेहरा लाल पड़ जाता था...बाहें चढ़ जाती थीं...कई बार हम सब पेपर को मोड़ते थे और बंडल बनाते थे.....रात भर मैं सोने लगता था बीच में और फिर जगता था अचानक कि कहीं दीदी मुझसे ज्यादा अखबार ना मोड़ दे....पापा बोलते थे अब मुझे चिंता नहीं है मेरे हाथ तैयार हो गए हैं....अब लगता है काश पापा सचमुच देख पाते और हम उन्हें यकीन दिला पाते कि उनके हाथ आज सही मायनों में तैयार हो गए....बेबाकी के साथ चीजों को लिखने के लिए जाने जाते थे रामेश्वर उपाध्याय...ये बात मैंने सुन रखी थी...सुना था उनके साहित्यिक और सियासी मित्रों से कि बहुत अच्छे वक्ता थे...बेबाक बोलते थे और आग लिखते थे...भोजपुर न्यूज पर कई मुकदमें भी हो गए थे इसी बेबाकी की वजह से....और बाद में खराब आर्थिक हालात के बीच पापा को वकालत भी इसी लिए शुरू करनी पड़ी थी क्योंकि मुकदमें ज्यादा थे अपने ऊपर और उन्हें लड़ने के लिए पैसे नहीं थे.....फिर बैतलवा उसी डाल पर उनकी बेबाकी का ही एक नमूना था...


अमृत प्रिंटिंग प्रेस का उद्घाटन...भोजपुर न्यूज छपने की शुरूआत
 पापा की हत्या के बाद मुझे उनके साहित्यिक रचनाओं, उनके तेवर, पत्रकारिता का दौर, जेपी आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी इन सबकी जानकारी मिल सकी...मैं इन बातों को जानने के लिए खूब भागा...उन कुछ सालों के बाद जिनकी तमाम रातें छत पर आसमान तकते निकल गईं..चरम आक्रोश और दिशाहीनता के साथ....मैं पापा के कई मित्रों से मिला...उनकी रचनाओं का संकलन किया..अखबार और पत्रिकाओं में छपे उनके लेखों को संजोया....और तब जाकर मुझे पता चला है कि मैं रामेश्वर उपाध्याय के साथ रहता आया था और मुझे खबर भी नहीं....पापा के बारे में जो बातें सुनी सुनायीं थी उन्हें मैं महसूस कर सका जब उन्हें पढ़ने का मौका मिला.... जेपी मूवमेंट के दौरान लिखा गया पापा का उपन्यास नागतंत्र के बीच पढ़ा...इसकी भूमिका में लिखा गया है कि '13 सितंबर 1978 को आरा जेल-गेट पर मुझसे मिलने

गोपाली चौक पर अनशन की तस्वीर
कमलेश्वर, अमरकांत, अजित पुष्कल, मधुकर सिंह और पचास से ऊपर लेखक मित्र आए थे....और उन्होंने मेरे संबंध में यह धारणा बना ली थी कि मैं जेपी की संपूर्ण क्रांति का आदमी होकर जेल में हूं...लेकिन मैं ऐलानिया तौर पर कहना चाहता हूं कि हमारा संबंध वामपंथी ताकतों से था और हम अपनी सही समझदारी के साथ आंदोलन में थे। हां, हमारा दुर्भाग्य यह जरूर रहा कि वामपंथी ताकतें तत्काल कुछ कर नहीं सकीं और नेतृत्व उनके हाथ से निकल जाने के कारण हमें भी संपूर्ण क्रांति का आदमी करार दिया गया।....' ये उस युवा लेखक की सोच और तेवर की तस्वीर को साफ करता है..
पांचवीं तक की पढ़ाई आरा से सटे अपने गांव बभनगांवा में पूरी करने के बाद पापा शहर पहुंचे थे...बाबा जैन मंदिर में पुजारी थे....उस वक्त जो भावनाएं पापा में घर करती रहीं उसी ने उनमें लड़ने का जुनून पैदा किया होगा जैसा कि उनकी किताबों से समझ में आता है...बेबाकी के साथ उन्हें बोलने की आदत वहीं से पड़ी शायद....शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ने की मुहिम और उससे ज्यादा उन लोगों को बेहतर बनाने की कवायद जिनकी उम्र सलामी दागते निकल गई...दो जून के रोटी की जुगाड़ में....


नीतीश कुमार और रामेश्वर उपाध्याय....74 आंदोलन के दौरान की तस्वीर

पापा आंदोलन में कूद पड़े थे...1974 का छात्र आंदोलन जिसे बाद में जेपी का नेतृत्व मिला...बाबा बहुत नाराज थे..उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा जैन मंदिर में पुजारी के विरासत को सम्हाल लेगा...लेकिन ऐसा हुआ नहीं...आंदोलन के दौरान पापा मीसा के तहत जेल में रहे करीब ढाई साल...और इसी दौरान उन्होंने अपनी कहानिय़ों, उपन्यास और नाटकों से शोषण विहीन समाज की स्थापना की दिशा में जमीन तैयार करने में एक ईमानदार लेखक की भूमिका को निभाया....हालांकि इसे लेकर नाराजगी का दंश भी झेलना पड़ा...सिर्फ समाज में नहीं बल्कि घर में भी...परिवारिक स्थिति, परिवार के लोगों और रिश्तेदारों की मानसिकता, कुल मिलाकर कहें तो चीजों को सीधे तौर बिना किसी लाग लपेट के लिख देने पर नाराजगी भी थी कई लोगों को...खुद मेरे बाबा को...राजनीतिज्ञ के तौर पर पापा की शुरूआत हुई थी और लेखक के तौर पर परत-दर-परत कुव्यवस्था को उघेरना वो चाहे राजनीति से प्रेरित हो या फिर समाजिक कुव्यवस्था से...मेरी समझ में बदलाव की आस में ही उन्होंने आंदोलन में हिस्सेदारी की और

तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ रामेश्वर उपाध्याय (गले में हरा शॉल)

बदलाव की आस ने ही उनकी कलम को ताकत दी....कई दफे बाबा ने घर से निकलने को तक कह डाला...और रात-बिरात पापा ने बच्चों के साथ समान लेकर घर छोड़ा भी....समाजिक लड़ाई को प्राथमिकता दी तो परिवार को अपनी जिम्मेदारी समझा...इसी के तहत पापा ने मोटर पार्ट्स का दुकान खोला....कोयला तक बेचने का काम हुआ और जन-वितरण प्रणाली की दुकान भी खोली...लेकिन ये कवायद सरवाइवल की उसी कहानी का हिस्सा था जो पापा हमें गुलाब की कली और कचरा चुनते बच्चे को दिखाकर समझाना चाहते थे..जो लड़ाई उन्होंने खुद लड़ी थी..पापा का सलेक्शन हुआ था लेक्चररशिप के लिए लेकिन न्यूजट्रैक में

मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के खिलाफ छपी एक रिपोर्ट की कीमत चुकानी पड़ी और पैनल रद्द हो गया....लेकिन इन बातों को पापा ने कभी तरजीह नहीं दी...दरअसल उन्हें सरकारी नौकरी करना कभी मंजूर ही नहीं था...इसलिए बाद के दिनों में जब इंटरव्यू कॉल आया तो पापा ने ये नौकरी नहीं करने का निर्णय लिया....अंतिम दिनों में उनमें इस बात की कसक को हम महसूस करते थे कि समाज में बेहतरी की लड़ाई में उनका दखल परिवारिक झमेलों में फंस कर सिमटता गया था...



मां और पापा...छत पर बैठ कर सुकून के पल

पापा गर्मी की सुबह और शाम को छत पर जरूर बिताते थे...आसमान की लालिमा उन्हें पसंद थी...बेहद भावुक क्षण होते थे उनके लिए...जिस वक्त उनकी कसक उनकी बातों से ज्यादा डबडबाई आंखों में महसूस किया जा सकता था....उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में मैंने उन्हें कुछ हद तक समझा था..ऊपरवाले का शुक्रगुजार हूं कि कम दिन ही सही लेकिन कुछ वक्त रामेश्वर उपाध्याय के साथ गुजरा...। बहुत दिन पापा के साथ रहा मैं..लेकिन आखिरी दिनों में रामेश्वर उपाध्याय के साथ को भी कुछ हद तो जरूर महसूस किया मैंने....। उन दिनों उन्होंने फिर से कलम उठा ली थी और एक उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था....कचहरी पर किताब लिखने की तैयारी में थे वे...शाम को जब हम छत पर बैठते थे तो भुट्टा खाया करते थे...रोज भैया भुट्टा लाते थे और शाम में कोयले पर उसे पकाकर खाया करते थे..मैं गांव से मिर्च का एक पौधा लाया था...उस पौधे की मिर्च को भी खाते थे हम...और उसी दौरान अक्सर पापा बोलते थे समय कम है काम बहुत ज्यादा करना है....ये समय कम है का एहसास उनकी छोटी उम्र से ही समाया हुआ था उनमें...इसीलिए ज्यादा सोते नहीं थे पापा...रात में अक्सर 1-2 बज जाता था पढ़ाई लिखाई करते हुए....और सुबह सुबह 4 बजे उठकर मार्निंग वॉक...सात बजे से ही ऑफिस में लोग बैठने लगते थे मुलाकात के लिए...फिर दिन भर की भागदौड़..आखिरी दिनों में उन्होंने गाय रखी थी तो दूध दूहते खुद थे...दरअसल एक यादव को दूध दूहने के लिए बुलाया गया था लेकिन उसने किसी दिन गाय को पीट दिया था...बस उसी दिन पापा ने उसे हटा दिया...छोटे टेबल को आधा काट दिया और फिर बैठकर बड़े आराम से दूध दूहते..आश्चर्य होता कि पापा एक ही हाथ से दूध निकालते बिना गाय का पैर छाने...लेकिन गाय बड़े आराम से खाते रहती..
इमरजेंसी के दौरान
.शूर के पक्के थे बिल्कुल...जब मकान बन रहा था हमारा तो रोज राजमिस्त्री कमरे का कोन बनाते वक्त काम बंद करता था..सुबह आकर उसमें खासा समय लगाता था...एक दिन पूछने पर पापा से उसने कहा था कि बाबा बहुत कठिन होला कोन बनावल एही से इत्मीनान से करीलां...और ये भी कि सारा काम सभी नहीं कर पाते...बस फिर उसी रात में पापा ने हाथ लगा दिया प्लास्टर करने में...पापा और भैया ने मिलकर रात भर में एक तरफ की आधी दीवार को प्लास्टर कर दिया था..आज भी देखने पर कोई नहीं कह सकता कि ये राजमिस्त्री का किया हुआ काम नहीं है...पापा कहते थे जरूरत पड़े तो कलम उठा लो और जरूरत पड़े तो कुदाल उठाने में हिचक नहीं हो...शायद इसी सीख ने हमें मजबूत किया उनके बाद भी...19 अक्टूबर 1997 हमारा जीवन थम गया...हम जिंदा लाश बन गए...लेकिन पापा की बातों ने उनकी रचनाओं ने, उनकी आवाज के एहसास ने..हमें फिर से जगाया...ये एहसास कराया कि जिंदगी संघर्ष का नाम है उस कचरा चुनने वाले लड़के की तरह जो हर रोज संघर्ष की एक नई लड़ाई लड़ता है...
पापा की मौत के बाद भी हम जिंदा हैं उन ठहाकों को महसूस कर जो हमेशा जिंदादिली से भरी जिंदगी की तरफ ले जाती हैं...इस एहसास के साथ कि..

सूरज फिर निकलेगा......

बादल बरपाने लगे हैं कहर,

वर्षा की भींगों से अब तो भींग रहा सारा ये शहर

लेकिन आखिर अंत में वो फिर निकलेगा

बादल में तो दरार पड़ेगी, सूरज टुकड़ों में न बंटेगा

अस्त हुआ है समय से पहले, समय को पाकर फिर उभरेगा

धरती को जलमग्न बनाने से पहले वो फिर उभरेगा

अंतिम जीत उसी की होगी, आने की वो बाट तकेगा
धरती को जलमग्न बनाने के पहले,

वो फिर निकलेगा......
(जनपथ में प्रकाशित)

Friday, December 31, 2010

नए साल की सुबह...(संस्मरण)

( ये संस्मरण मैंने कुछ महीने पहले लिखा था...यादों की कसक से हार कर और हिम्मत कर....लंबा संस्मरण होने की वजह से मैं इसे जारी करने में हिचकता रहा..लेकिन आज जबकि पापा की कही बातें कानों से टकरा रही हैं..नये साल की शुरूआत नई उम्मीदों और नए संकल्पों के नाम करने से पहले मैं उन यादों में समा जाने की कोशिश कर रहा हूं..,.,सिर्फ एक बेटे के तौर पर ही नहीं बल्कि एक कथाकार,पत्रकार, रंगकर्मी और समाज का अहम हिस्सा रह चुके शख्सियत से जुड़ाव के बूते जो महसूस किया,क्रमवार  जारी कर रहा हूं....नए साल पर)



मैं पापा के तौर पर ही जान सका उन्हें...रामेश्वर उपाध्याय किस शख्सियत का नाम है, ये समझने का मौका नहीं मिला शायद..बहुत छोटा था मैं, कहने को उंगुलियां पकड़नी सीख ली थी लेकिन दरअसल उनकी उंगुलियों के स्पर्श के भाव और गहराई को समझने का दौर था, जिस वक्त पापा हमसे दूर चले गए...इसलिए मैं पापा के बारे में ही कुछ लिख सकूंगा..क्योंकि रामेश्वर उपाध्याय के बारे में लिखने की सोच रहा हूं पिछले तीन दिनों से लेकिन शब्द साथ देने को तैयार नहीं है....तस्वीरें जेहन में बिल्कुल ताजा हैं...मैं महसूस कर सकता हूं...ठंड के दिनों में सुबह साढ़े चार बजे का वक्त हुआ करता था जब पापा हमें मॉर्निंग वॉक के लिए उठाते थे..फिर हमसभी रमना मैदान जाते थे टहलने...मैं साइकिल भी चला लेता था वहीं और कभी क्रिकेट खेलता था...छोटा था लेकिन मैं जब खेलता या साइकिल चलाता तो पापा के चेहरे पर खुशी को उस वक्त भी महसूस कर सकता था, हां समझ शायद नहीं थी...आज समझ पाता हूं, ये उस कसक के खिलाफ जीत की खुशी थी जो बचपन से पापा ने महसूस किया होगा...पापा टहलते वक्त तेज कदमों से चलते थे....हरे घास पर..मुझे याद है अक्सर लौटते वक्त कचरा उठाते बच्चों को देखकर उनकी रफ्तार धीमी पड़ती थी..फिर वो हमें दिखाते थे--'ये तुम्हारे ही जैसे बच्चे हैं...लेकिन इन्हें भूख से लड़ने के लिए कचरा चुनना पड़ता है..कचरे में मिले प्लास्टिक और शीशे की बोतलों को बेचकर ये चवन्नी की कमाई करेंगे और तब जाकर आज सुबह की भूख मारने का जुगाड़ हो सकेगा..ये बातें इसलिए नहीं थी कि हमें उनपर दया आए...बल्कि कई दफे सुनने के बाद इन बातों ने तय कर दिया था कि ये लोग जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं..स्ट्रगल फॉर सरवाइवल....वक्त बीता...मुझे क्या पता था कि जिस इंसान की उंगुलियां पकड़कर मैंने चलना सीखा वो एक बेहद दूरदर्शी सोच वाला इंसान है....एक ऐसी शख्सियत जिसकी अपनी नींव उनकी खुद की रखी हुई थी...और हमसे कही गई हर बात का जिंदगी भर साथ देने वाला अर्थ होता था। एक दिन गोला गया था मैं सब्जी लाने, शायद ये दूसरी या तीसरी दफा होगा जब मैं सब्जी लाने के लिए गया हूं..अक्सर भैया जाते थे...गोला पहुंचा तो मेरी क्लास का एक लड़का साग बेचते हुए दिख गया था...मैंने उसे देखा और बिना सब्जी लिए घर की तरफ भागा...आंखें डबडबाई हुईं थीं...शाम का वक्त था, पापा छत परबैठे हुए थे....मैं सीधा छत पर पहुंचा था और पापा ने देखते ही पूछा था क्या हुआ बेटा...मैं फफक कर रो पड़ा था..


मीसा के तहत नजरबंदी के बाद की तस्वीर
 .शायद जिंदगी की ऐसी हकीकत को देखने का पहला मौका था...पापा ने मुझे समझाया...उन बातों ने उस दिन कचरा उठाने वालों से लेकर सब्जी बेचने वाले अपने दोस्त तक की तस्वीर का मर्म समझा दिया था.और उस दिन अपने साथ पढ़ने वाले उस लड़के के लिए जो सम्मान जागा वही नींव शायद पापा रखना चाहते थे...सुबह टहल कर हम वापस आते तो चाय होती..हाफ कप चाय पीते थे पापा..कड़क..बोलते भी थे मम्मी से...मनुआ हाफ कप चाय बनाओ.थोड़ा कड़क...मनु बोलते थे पापा मां को..और अक्सर मनुआ...गर्मी की सुबह हो या फिर ठंड की...सुबह पापा बागवानी जरूर किया करते थे..छत पर उन्होंने करीब 200 पौधे लगाए थे..जिनमें अधिकतर थे गुलाब..गुलाब की नयी कलियां जिस दिन खिलती थीं उस दिन की सादगी सबसे ज्यादा होती थी शायद उनके लिए...सबको आवाज देकर बुलाते थे छत पर से...और उनकी बातों में इतनी गहराई होती थी कि उस कली के खिलने की खुशी को हम महसूस कर लेते थे...जिंदगी भर याद रह जानेवाली दूसरी सीख हमें छत पर खिले कलियों को देखते वक्त ही मिली...पापा बताते थे कली से गुलाब बनने तक का सफर फिर गुलाब की खुबसूरती का चरम और वक्त के साथ उसका मुरझा जाना, हां और ये भी कि अगर किसी ने इसे तोड़ दिया तो उम्र के पहले की मौत का दर्द होगा..उसे भी और उसे देखकर खुश होनेवालों को भी..लेकिन उसके बाद ये भी कि यही संघर्ष जीवन है...। पापा की इस बात का साथ बेहद मजबूत रहा....बहुत मजबूत...। जिस पुराने मकान में रहते थे हम वहां दो कबूतर रहा करते थे मेरे कमरे के ऊपर एक वेंटीलेटर के लिए जगह छोड़ा गया था वहीं उन्होंने घोंसला बनाया था....दिन भर शांत से बैठे रहते..
पत्रकारिता के दौरान की तस्वीर
एक उड़ता फिर कोई डंठी लेकर चला आता..फिर उनके अंडे हुए पांच...और बिल्ली की नजरें गड़ गईं...एक अंडा फूट गया गिरकर, बच्चे हुए तो दो मर गए...पता नहीं कैसे..हमारा मन उदास था और हम तीनों भाई बहन को खाने तक मन नहीं हो रहा था...उस दिन पापा ने फिर समझाया था जिंदगी की लड़ाई को देखने का नजरिया कैसा हो...ये सब मिलकर अब समझ में आती है..महसूस होती हैं..पापा की बातें..संघर्ष करने वालों की जीत होती है....ये सबक जिसने हमारे मन में बीज डाला कि कमजोर लोग जिंदगी से भागते हैं..जिसकी बदौलत हमने पापा की हत्या के बाद आत्महत्या करने की नहीं सोची...जिसकी बदौलत हमने लड़ने की ठानी...और मझधार में तैरने की कोशिश की...
(क्रमश:)

Monday, November 22, 2010

दर्द का हद से गुजरना है दवा बन जाना



(सुरेंद्र स्निग्ध के साथ ये इंटरव्यू मैंने अक्टूबर 2005 में की थी..इस इंटरव्यू की कई बातें अपील करती हैं..पांच साल बाद भी बिहार में बातों का मिजाज तो बदला है लेकिन स्थितियां कमोबेश पुरानी ही है...लिहाजा इस इंटरव्यू को सार्थकता बरकरार होने की वजह से इसे जारी कर रहा हूं...हो सके तो पढ़िए..)

सुरेंद्र स्निग्ध के साथ अमृत उपाध्याय की बातचीत पर आधारित...(13 अक्टूबर 2005 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

क्या सत्ता का पुराना समीकरण टूट रहा है? अगर ऐसा है तो इसके मायने क्या होंगे?

बिहार के राजनीतिक मन-मिजाज को दिल्ली नहीं समझ पा रही है। और तो और समाज का चौथा स्तंभ समझा जाने वाला मीडिया भी बिहार के मन-मिजाज को समझने में पूरी तरह असफल है। एयर कंडीशन स्टूडियो और चैंबर में बैठ कर और कुछ मनगढ़ंत सैंपल के आधार पर राजनीतिक विश्लेषण का तरीका अत्यंत हास्यास्पद है, अवैज्ञानिक तो है ही। प्राचीन समय से ही बिहार का राजनीतिक मन-मिजाज एकदम अलग रहा है। जब पूरे विश्व में राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र की सुगबुगाहट भी नहीं थी, तब वैशाली का गणराज्य, लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में पूरे विश्व को एक नयी दिशा दिखा रहा था।भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई हो या सत्ता में पिछड़ों की भागीदारी का सवाल या ब्राम्हणवाद के खिलाफ लड़ाई का मजबूत गढ़ उत्तर बिहार या उसके पहले भी बौद्धों या जैनियों के द्वारा ब्राम्हणवाद के खिलाफ पूरे विश्व के परिदृश्य में बिहार को केंद्र के रूप में खड़ा किया गया था। बिहार हमेशा ही राजनीति की मुख्यधारा से अलग अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। इसके समाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक कारण हैं। दरअसल सत्ता का स्वरूप जो केंद्र में रहा, वह बिहार में कभी रहा ही नहीं। सोशलिस्टों का भूमि हड़प आंदोलन हो या जय प्रकाश के नेतृत्व में छात्र आंदोलन। इसके पहले भी एकीकृत बिहार का चाहे मुंडाओं का आंदोलन हो या मुसहरी के अत्यंत पिछड़े समुदायों का आंदोलन। सत्ता का वह रूप जो केंद्र के द्वारा निर्धारित था बिहार ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। जाहिर है, सत्ता का नये-नये समीकरण बिहार में बनते और बिगड़ते रहे हैं। अगर आपका आशय लालू यादव की सत्ता से है, तो मेरा निवेदन है कि लालू यादव नये रूप में फिर आ रहे हैं। भले ही उसका नेतृत्व किन्हीं के हाथों में हो, भीतर लालू ही होंगे। क्योंकि लालू अब सिर्फ एक नाम नहीं हैं, वे प्रवृत्ति हैं, नीतीश कुमार हों या रामविलास पासवान, ये सारे लालू के ही अलग-अलग चेहरे हैं।

बिहार की बदहाली, शासनहीनता और अराजकता का परिणाम क्या हुआ? इसके लिए क्या लालू जिम्मेवार हैं? क्या अब बिहार सही दिशा में जाएगा..

आपका दूसरा सवाल बिहार के बाहर, बिहार की छवि को बदनाम करने के लिए एक सोची समझी साजिश के तहत उठाया गया सवाल है। बिहार इस ग्लोब से बाहर का कोई मानचित्र नहीं है। पूरे वैश्विक परिदृश्य पर बद्हाली, पिछड़ापन, अराजकता इन तमाम स्थितियों के नाम पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के द्वारा उठाए गए नाम हैं। परदे के पीछे गैंगमास्टर की भूमिका में हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और अमेरिकी सम्राज्यवाद, जो मुखौटा लगा कर इसके पीछे खड़ा है। बिहार अकेला नहीं है, सम्पूर्ण हिंदी पट्टी इसी बद्हाली जी रहा है। तमाम ऐसे प्रदेश हैं जहां का जीवन कृषि आधारित है, पिछड़ा है। सत्ता की लूट-खसोट में शामिल सभी लोग शातिर अपराधी हैं। कोई अपहरण करता है, कोई अपहरण करवाता है, लेकिन आम जीवन कितना सुरक्षित है? कभी इन परिस्थितियों का भी खुलासा किया जाना चाहिए। ऊपर-ऊपर दिखने वाला शांत जल भीतर से सुनामी को समेटे हुए होता है। बिहार को बद्नाम करने के षड्यंत्र का भी पर्दाफाश होना चाहिए। फिर बिहार की जिस बद्हाली की आप बात कर रहे हैं, उसके लिए किसी का भी दस-पन्द्रह वर्षों का शासन काल दोषी नहीं हो सकता। भारत की आजादी के बाद यहां की राजसत्ता पर बदले हुए रूपों में जो लोग काबिज हुए हैं, सारा कुछ उन्हीं के द्वारा खेला जाने वाला नाटक है। आप बार-बार सत्ता की बात कर रहे हैं। हमलोग तो सपने देखने वाले उस जमात के लोग हैं, जो व्यवस्था परिवर्तन की बात सोचते हैं। गद्दी से जॉन के चले जाने के बाद जगदीश के बैठने से कोई अंतर नहीं हो जाता। जबतक मेहनतकश मजदूरों और किसानों या श्रमशील जनता के हाथों में सत्ता की चाभी नहीं होगी, व्यवस्था नहीं बदलेगी। बदलते रहिए लालू की जगह नीतीश, नीतीश की जगह रामविलास या कि सूरजभान या कि मुन्ना शुक्ला या पप्पू यादव, ये नाम अलग-अलग हैं, लेकिन हैं एक ही व्यक्ति का। और सत्ता पर काबिज होगा यही व्यक्ति।

क्या दलित-अतिपिछड़े बिहार में किसी तीसरे धुव्र के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं? यदि हां, तो ये धुव्र कितना ताकतवर होगा?

आपका यह प्रश्न दरअसल अगले प्रश्न के सपनों के साथ जुड़ा हुआ है। दलित के पर्याय अगर रामविलास हैं, अगर पिछड़ों के पर्याय लालू यादव और नीतीश हैं और अल्पसंख्यकों के पर्याय यदि शहनवाज हुसैन या शहाबुद्दीन हैं तो विश्वास कीजिए की बिहार रसातल की ओर जा रहा है। तीसरे विकल्प की कुंजी वामपंथी सोच वाली राजनीति के पास है लेकिन यह कैसा वामपंथ जो आधा रामविलास के साथ जुड़ा हुआ हो और आधा लालू यादव के साथ। नक्सलबाड़ी आंदोलनों से जुड़े हुए राजनीतिक कार्यकर्ता इतने धड़ों में बंटे हुए हैं, कि समझ में नहीं आता कि तीसरा विकल्प बनाएगा कौन। लेकिन आश्वस्त रहिए अराजकताएं जितनी बढ़ेंगी जनता अपना रास्ता तलाशेगी। जनता महान होती है, आप कुछ क्षण के लिए तो उन्हें जरूर ठग सकते हैं, लेकिन अंधेरे में बहुत दिनों तक भटका नहीं सकते। दर्द जब हद से गुजरेगा तो वह दवा जरूर बनेगा- ‘दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना’

लालू का तिलिस्म टूटने की स्थिति में बिहार में बाजार और मध्यवर्ग की क्या स्थिति होगी?

लालू का तिलिस्म टूटा नहीं है। बिहार के पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों ने लालू में अपने सपनों को देखा। पहली बार बिहार की मध्यवर्गीय शक्तियों को अपनी सही शक्ति का एहसास कराया था लालू ने। बिहार में वर्षों से जड़ जमायी हुई सवर्णवादी मानसिकता और सवर्णों,जमींदारों, पुरोहित-पंडितों के द्वारा इन मध्यवर्ती जातियों का समाजिक और सांस्कृतिक शोषण जितना हुआ था, लालू यादव में उसकी मुक्ति का सपना देखा था। लेकिन जब लालू यादव खुद ही सामंती मन-मिजाज में परिवर्तित हो गए। तंत्र-मंत्र और ढकोसलों में लिप्त हो गए। ब्राम्हणवाद का विरोध करते हुए जिस तरह से स्वयं ब्राम्हणवाद का पर्याय हो गए, बिहार के इस बड़े जनसमुदाय की जन-अकांक्षाओं की आकस्मकि मृत्यु हो गई। इन स्थितियों के बाद लालू यादव का तिलिस्म टूटा तो जरूर, लेकिन नए-नए रूपों में ही तिलिस्म कभी नीतीश कुमार के रूप में तो कभी रामविलास पासवान के रूप में खड़े होते रहे या हो रहे हैं, उनके सामने। लेकिन लोग यह भी जान रहे हैं कि नीतीश कुमार के पीछे किस तरह की शक्ति और मानसिकता खड़ी है। फासीवाद, सांप्रदायिक और जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वालों को संरक्षण देने वाले ये नेता लालू के बदले सत्ता में बैठ तो जरूर जा सकते हैं लेकिन सही विकल्प कभी नहीं दे सकते। मध्यवर्ग और मध्यवर्ती जातियां ऐसे चौराहों पर खड़े हैं, जहां से विकल्प का कोई रास्ता नहीं खुलता।

बिहार में अपराधीकरण के मसले पर क्या स्थिति बनेगी?

अपराध की प्रवृत्ति, पूंजीवाद की उपज है। पूंजीवाद ने बाजार में जिस तरह के सुनहले सपनों की दुकानें सजा रखी हैं और हर किसी में इन सपनों को खरीदने के लिए जिस तरह की बेचैनी पैदा कर दी है। अपराधीकरण इसी बेचैनी का पर्याय है और यह अपराधीकरण सिर्फ बिहार की समस्या नहीं है। बन्धु, यह है ग्लोबल फेनोमेनन। दुख, पीड़ा, परेशानी, दर्द और आंसुओं की भी मार्केटिंग कर रहा है ये पूंजीवाद। हत्याओं की मार्केटिंग हो रही है। अब आप कह रहे हैं कि कैसा होगा अपराधीकरण भविष्य में। तो सिर्फ यही निवेदन किया जा सकता है कि भविष्य में भी ऐसे ही अपराध होंगे।

बिहार नक्सलवाद का मजबूत गढ़ रहा है। लालू को शासक वर्ग की ओर से यहां नक्सलियों के जवाब के रूप में लाया गया था। अब उसके कमजोर होने की स्थिति में नक्सलवाद की क्या स्थिति होगी?

बिहार समाजवादी आंदोलनों का गढ़ रहा है। बिहार में नक्सलबाड़ी आंदोलन को आधारभूमि देने में इसी वर्ण संघर्ष ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। जहां सामंतों और श्रमिकों के बीच(खेतिहर मजदूर सहित) संघर्ष जैसी पृष्ठभूमि रही है। नक्सलबाड़ी आंदोलन वहां उसी रूप में फैला है। लालू यादव को नक्सलियों के खिलाफ खड़ा किया गया था, मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं। मैंने पहले भी कहा है कि लालू यादव बिहार के वृहत्तर पिछड़ी जातियों के सपनों का नाम था। लालू यादव ने युगों से उपेक्षित पिछड़े वर्ग को स्वाभिमान दिया है, यही स्वाभिमान इन जातियों में राजनीतिक भूख के रूप में बदल गया। नक्सलबाड़ी आंदोलनों ने अगर विवेक से काम लिया होता और आधारक्षेत्रों के संघर्षों को विकसित किया होता तो निश्चित रूप से इसके द्वारा लगाई गई फसल या फल को लालू नहीं काट पाते।

पूंजी निवेश से वंचित और आर्थिक विकास की बाजारवादी प्रक्रिया से बहिष्कृत बिहार का क्या भविष्य होगा?

भगौलिक और प्राकृतिक रूप से अविभाजित बिहार धन-धान्य से परिपूर्ण था। झारखंड राज्य अलग होने के बाद शासक वर्ग के हाथों में सोने की थाली मिल गई है। बिहार का अस्सी प्रतिशत राजस्व झारखंड के इलाकों से प्राप्त होता था। शेष बिहार पूरी तरह कृषि आधारित है, और कृषि को आजतक उद्योग का दर्जा हम नहीं दे पाए हैं। शेष बिहार की भगौलिक संरचना देखें, हर साल पूरा इलाका बाढ़ और सूखे से प्रभावित रहा है। जिन इलाकों में नगदी फसलें तैयार हो रही हैं वहां के उद्योग-धंधे वर्षों से बंद हैं, यहां की चीनी मीलें सिर्फ पन्द्रह वर्षों से बंद नहीं हैं, यहां की जूट मील उवर्रक तथा तेलशोधक कारखानें इसलिए बंद नहीं हैं कि बिहार में कोई वैकल्पिक आंतरिक संरचना नहीं बदल रही। गौर कीजिए ये फैक्ट्रियां लगी हैं बिहार में और इसका मुख्यालय है कलकत्ता में। लौह अयस्क निकलता था चाईबासा में, प्रोसेस्ड होता था कलकत्ता में।

नया बिहार बनाने के लिए जरूरत है सिर्फ कल्पनाशीलता की।हर साल आने वाली बाढ़ को नियंत्रित कर उत्पादन की दूसरी दिशाओं में उनकी शक्तियों को लगाया जा सकता है। बिहार में प्रतिभा और श्रम दोनों ही कच्चे माल के रूप में प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हैं, आवश्यकता है उत्पादन के रूप में उन्हें ढाल देने की।
                                                                             

Saturday, October 16, 2010

बीच सफर में....

ये सड़कें,


बिल्कुल सपाट सी तो नहीं,

लेकिन इतनी

कि चिढ़ा सकें गांव और कस्बों से

मोटरी बांध कर आए लोगों को,

और लजा जाएं हमारे जैसे चंद लोग।
चंद क्यों, पूरी जमात ही

जो रोटी की तलाश में,

समा गए बड़े शहर में..

जिन्हें सुकून नहीं मिलता सोचकर,

कि भागते दौड़ते लोगों के पीछे लगकर,

सही तो किया न...

लजा तो मैं भी जाता हूं, रोज,

उनकी तरह,

जो नहीं जानते तहजीब

कि, सोये हुए इंसान की खुली आंखें

और खुली आंखों वाला सो रहा इंसान

इस सड़क की जरूरत हैं,

वाज़िब जरूरत, शायद।
                                             ---अमृत उपाध्याय

Thursday, September 16, 2010

जा रहा हूं।

मैं गाँव से जा रहा हूँ


कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए

मैं गाँव से जा रहा हूँ

अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

खेत चुप हैं हवा ख़ामोश,
धरती से आसमान तक तना है मौन,
मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं मेरे पुरखे... मेरे पित्तर,
उन्हें मिल गई है मेरी पराजय,
मेरे जाने की ख़बर

मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ । 
                                   --निलय उपाध्याय
(निलय उपाध्याय की इस कविता को पिछले कई दिनों से तलाश रहा था...फेसबुक पर एक बार फिर ये कविता पढ़ने को मिली...)

Sunday, August 22, 2010

बाबा...

झुर्रा गई बाबा के देह की चमड़ी,
उनकी हथेली का वो हिस्सा,
जिसके बूते उठाते थे वो,
दाल भात का कौर,
और अक्सर टकराते थे
मेरे होंठ ।
नेनुआ में बूंट की महक 
और कांख से निकलती
पसीने की गंध,
समाती नहीं है अब भीतर,
चुनौती देती है,
कि खोज लो कहीं
तो जानूं।


सात बुर्बकों वाला पंडित भी
गुम हो गया,
वो पाड़ा जिसने पीया था,
सात भैंसों की थान का दूध
और घी,
और टकरा गया था बाघ से,
और उजले छड़ी वाली वो परी
जो मिल जाए तो
लौट आएगा बचपन..
कि कांधा चढ़कर,
फिर घुमाउंगा मैं
बाबा की मूड़ी,
नन्ही उंगुलियों से
दिखाउंगा रास्ता और थकने पर
टेक दूंगा अपनी टुड्ढी,
कि फिर बढ़ जाएंगे बाबा के कदम
वाह लाल्ला जी, वाह लाल्ला जी
करते हुए, सरैयां बाजार
ललकी मिठाई के दुकान की ओर
और फिर सुनूंगा खप्पर वाले
अपने आंगन में खुले आसमान तले
रेडियो की खर्र खर्र और
काकी का चौपाल
और बाबा के कंबल में घुसकर
पूछवाउंगा सवाल कि
कहां हूं मैं..
कि फिर आएगी गहरी नींद,
जो नहीं मयस्सर होती अब
और उठ उठ कर
महसूस करूंगा,
बाबा के देह की छुअन।
सुबह गमछी में नहाएंगे जब
तो लड़ाउंगा डागा (सिर से सिर टकराना)
कइया वाले बोरिंग पर,
और गिरेंगी बारिश की बूंदें,
तो झुर्राई चमड़ियों में समा जाउंगा मैं
और मिल जाएगा बाबा को
उनका लल्ला जी.....
मुझे मेरा बचपन।
                                 ---अमृत उपाध्याय

Sunday, August 15, 2010

आज़ादी की कहानी, आम आदमी की ज़ुबानी..

(महुआ न्यूज़ पर आज़ादी के दिन प्रसारित स्पेशल बुलेटिन का एक हिस्सा....)

मैं आम आदमी हूं... आजाद..आजाद देश और आजाद अवाम का एक हिस्सा हूं..मैं आजाद हूं...अंग्रेजों के खिलाफ मेरे पुरखों के खून जिस मिट्टी पर पसरे थे मैं उसी मिट्टी का एक लाल हूं..जो महसूस करता हूं आजादी को अपनी रगों में...इस आजादी का फक्र मुझे हर दिन सुबह की लालिमा, दोपहर की तल्खी और सांझ के धूसर सौंदर्य में महसूस होता है..लेकिन फिर भी कहीं उदास हूं मैं...जब किसी गांव में नंगा कर दी गई सुखनी डायन बताकर और भीड़ टूट पड़ी उस पर भूखे भेड़िये की तरह, जब देह में धंस रही नजरों की वजह से घर के बाहर जाकर नहीं पढ़ सकी मुन्नी, जब अनाज उपजाने वाले किसान के हाथ में मुट्ठी भर गेहूं समेट सकने से ज्यादा आसान फांसी लगा लेना होता है, जब भूख से मर गया था कानू डोम और सरकारी नुमाइंदों ने नहीं मानी भूख को मौत की वजह...जब नक्सलियों और पुलिस के बीच हर रोज खेला जाता है एक दूसरे को लाशों में तब्दील करने का खेल.....जब प्रांतवाद के नाम पर सड़कों पर रोजी रोटी चलाने वालों पर बरसाईं जाती हैं लाठियां..जब रोज अपने आशियाना को डूबते देख रहे लोगों की बेचैनी पर गाढ़ा होता जाता है सियासत का रंग और सियासतदां के घर के कमरे में फैली रूम फ्रेशनर की खुशबू में दब जाती हैं लाशों से आती बू...तो दरक जाता है मेरा
कलेजा...क्योंकि मैं आम आदमी हूं....आजादी का रंगीन चश्मा पहने आम आदमी...आजादी के आइने में देश के युवाओं के चेहरों पर झुर्रियां और जवान शरीर पर बेड़ियां देख के रोता हूं मैं...और तब लगता है आजादी के इस रंगीन चश्मे का रंग काला पड़ गया और छा गया आंखों के सामने अंधेरा...फिर तलाशने लगता हूं मैं आजादी के मायने...तब लगता है मुझे कि घर में तकिया के भीतर मुंह छिपाकर रो लेना ही आजादी है तो हैं हम आजाद,नहीं तो मुंहतक्की करनी पड़ेगी जनाब...आजादी को महसूस करने के लिए...लेकिन फिर अचानक फड़क जाती हैं मेरी देह..कुछ लोग हैं जो लड़ रहे हैं नंगई के खिलाफ...कुछ तैयार बैठे हैं इस लड़ाई का कंधा बनने के लिए...ये लोग अंदरूनी तौर पर आजादी को खा रही ताकतों से बचाने की फिराक में लहूलुहान कर रहे हैं अपनी देह...कुछ लोग जिंदा हैं और जगे हुए हैं..ये लोग हैं आम आदमी बिल्कुल मेरी तरह..आपकी तरह... यही आस काले चश्मे का रंग फिर रंगीन कर देती है..और फक्र होता है कहने में कि मैं....आम आदमी हूं और मैं आजाद हूं...
                                                                                                                                   ---अमृत उपाध्याय
((इस इकरारनामे को जारी रखते हुए राकेश पाठक की कलम ने बयां किया है ...आज़ादी के दिन इस आम आदमी की अकुलाहट...))
आज न जाने क्यूं ऐसी कोई भी तस्वीर देखने का जी नहीं करता जिसमें परवाज़ की कोई गुंजाइश न दिखे। हर आखिर खास जो है आज का दिन। ज़रा महसूस करिए न अपने आसपास आज के धड़कते इस दिन को। सब वैसे ही है मंदिर की घंटी, अंगीठी में धधकती आग, चाय के गिलास में गिरने का सलीका। हमारी आपकी ज़िंदगी की भागम-भाग, उलझन सब। लेकिन फिर भी दिन खास है।
आज़ाद हवा की खुशबू कहीं अंदर तक उतरती है। कहीं नहीं रुकती थोड़ी देर थमती है फिर निकल चलती है। रंग आजादी के कई हैं...ज़ाएके भी तो हैं...हमारे अपने जाएके...आम आदमी के ज़ाएके...सबके पास अपना हुनर है आज़ादी को महसूस करने का। इसके ज़ाएके को चखने का।
फिर आज़ादी दरस तो ऐसे ही देती है दिन उगने के साथ...उसके बुझने के साथ। इस एहसास के साथ सारा आसमान हमारा न सही तो अपने वतन के ऊपर ठहरा आसमां हमारा है। इसकी पीली सुनहरी धूप हमारे ज़िस्म की हरारत में घुली है कहीं। तो आइए एक चाय के साथ हो जाए हमारी आज़ादी का सेलिब्रेशन....आम आदमी की तरह।
                                                                                                        ----राकेश पाठक