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13 जुलाई,मेरे लिए बेहद ख़ास तारीख़, कथाकार और पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय का जन्मदिन है आज। रामेश्वर उपाध्याय की पहचान एक सशक्त लेखक, जुझारू पत्रकार और ज़िंदादिल इंसान के तौर पर सबसे ज़्यादा रही। चौहत्तर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ कलम की बदौलत बदलाव की उनकी कोशिश जारी रही। 'मीसा' के तहत नजरबंदी के दौरान ‘नागतंत्र के बीच’ उपन्यास की रचना, चर्चित कहानी संग्रह ‘दुखवा में बीतल रतिया’ और 'गृहयुद्ध' उपन्यास लिखा उन्होंने। बतौर पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय ने 'नवभारत टाइम्स', 'धर्मयुग', 'श्रीवर्षा', 'रविवार','न्यूज ट्रैक' और 'सारिका' जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं में लगातार लिखा।‘भोजपुर न्यूज़’ अख़बार का संपादन किया। अख़बार और खुद पर कई मुकदमे हो जाने की वजह से उन्होंने वकालत शुरू की।
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(ऊपर:मीसा के तहत नजरबंदी के
बाद की तस्वीर)
(कमलेश्वर के साथ तमाम लेखकों की ये दुर्लभ तस्वीर है शायद, तस्वीर में बीच में कमलेश्वर हैं, उनके बायें हाथ के ठीक पीछे प्रेम कुमार मणि, उनके हाथ से सटे ठीक बायें मधुकर सिंह, और इन दोनों के बीच में पीछे रामेश्वर उपाध्याय...तस्वीर में दाहिने से दूसरे नंबर पर, जिनका हाथ एक बच्चे के कंधे पर है, वो हैं हृषीकेश सुलभ , सारे लेखकों को मैं दरअसल नहीं पहचान सका हूं अबतक)कथाकार भीष्म साहनी की दृष्टि में....
जमाना सचमुच बदल रहा है। पिछली पीढ़ी के लेखकों का नजरिया आज के यथार्थ के प्रति इतना बेलाग और दो-टूक नहीं हो पाता। शायद इसकी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि उनकी यादें, उनके संस्कार, बीते कल की उनकी आशाएं-आकांक्षाएं उनके आड़े आती रहती हैं और उनकी दृष्टि को प्रभावित करती रहती हैं। आजादी के पहले के देशव्यापी संघर्ष, लोगों के दिलों में पाई जाने वाली छटपटाहट, देश के जीवन में अनेक व्यक्तियों, राजनयिकों के साथ लगाव और आज के जमाने की बीते जमाने के साथ तुलना करने में ही सारा वक्त बीत जाता है।
नई पीढ़ी का लेखक इन पूर्वाग्रहों से मुक्त है। उसकी नजर आज की नजर है।वह आज के जीवन की विडंबनाओं-विसंगतियों को अतीत के संदर्भ में नहीं देखता, उन्हें आज की नज़र से ही देखता है।
इस संग्रह की अधिकांश कहानियों में भी इस दृष्टि की झलक मिलती है। रामेश्वर उपाध्याय उन चंद युवा कहानीकारों में से हैं, जो इसी बेलाग नज़रिये के कारण अपनी रचनाओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कहानियों में- भले ही वे निजी अनुभवों पर आधारित हों,अथवा आस-पास की जिन्दगी में से ली गई हों--एक प्रकार की सादगी, स्पष्टता और पैनापन पाया जाता है। उनकी नजर जिंदगी के अनेक पहलुओं की ओर गई हैं। कहीं हम जेलखाने की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे जा पहुंचते हैं, तो कहीं गली-चौराहे की भीड़ में अपने को खड़ा पाते हैं, जो एक रिक्शा वाले के पिट जाने पर इकट्ठा हो आती है, या एक तरूण लेखक के मनोद्वेगों के दायरे में, जो अपनी पहली रचना के छप जाने पर इतना उत्साहित है कि जीवन की सभी कटुताएं भूल चुका है। ये सभी कहानियां हमारे सामने जीवन का एक प्रमाणिक एवं सटीक चित्र प्रस्तुत करती हैं। पर इतना ही नहीं, सभी के पीछे लेखक का गहरा लगाव, मानवीय सद्भावना और प्रतिबद्धता भी झलकती है। वह समाज का यथावत चित्रण कर देने से ही संतुष्ट नहीं, वरन परिवर्तन की उन आदतों, ध्वनियों को भी सुनता है,जो बढ़ते जुलूसों की पदचाप में ही नहीं, जेल के सींखचों के पीछे पाए जाने वाली सन्नाटे में भी सुनाई दे जाती है।
रामेश्वर उपाध्याय की कलम से सशक्त, सुन्दर साहित्य पढ़ने को मिलता रहेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।
---------------भीष्म साहनी
(नोट-भीष्म साहनी की इस टिप्पणी को रामेश्वर उपाध्याय के चर्चित कहानी संग्रह 'दुखवा में बीतल रतिया' किताब से लिया गया है...)
('नागतंत्र के बीच' उपन्यास की भूमिका से नीचे लिखा अंश लिया गया है...ये रामेश्वर उपाध्याय की जिंदगी के सबसे यादगार दिनों में से एक था...)
'13 सितंबर 1978 को आरा जेल-गेट पर मुझसे मिलने कमलेश्वर, अमरकांत, अजित पुष्कल, मधुकर सिंह और पचास से ऊपर लेखक मित्र आए थे....और उन्होंने मेरे संबंध में यह धारणा बना ली थी कि मैं जेपी की संपूर्ण क्रांति का आदमी होकर जेल में हूं...लेकिन मैं ऐलानिया तौर पर कहना चाहता हूं कि हमारा संबंध वामपंथी ताकतों से था और हम अपनी सही समझदारी के साथ आंदोलन में थे। हां, हमारा दुर्भाग्य यह जरूर रहा कि वामपंथी ताकतें तत्काल कुछ कर नहीं सकीं और नेतृत्व उनके हाथ से निकल जाने के कारण हमें भी संपूर्ण क्रांति का आदमी करार दिया गया।....'
-रामेश्वर उपाध्याय
(कुछ और तस्वीरें खंगालने के बाद जारी करूंगा उन्हें, और हो सका तो संस्मरण भी जिसे लंबा होने की वजह से आज जारी नहीं कर रहा हूं...)