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Monday, July 12, 2010

हैप्पी बर्थ डे पापा....

13 जुलाई,मेरे लिए बेहद ख़ास तारीख़, कथाकार और पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय का जन्मदिन है आज। रामेश्वर उपाध्याय की पहचान एक सशक्त लेखक, जुझारू पत्रकार और ज़िंदादिल इंसान के तौर पर सबसे ज़्यादा रही। चौहत्तर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ कलम की बदौलत बदलाव की उनकी कोशिश जारी रही। 'मीसा' के तहत नजरबंदी के दौरान ‘नागतंत्र के बीच’ उपन्यास की रचना, चर्चित कहानी संग्रह ‘दुखवा में बीतल रतिया’ और 'गृहयुद्ध' उपन्यास लिखा उन्होंने। बतौर पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय ने 'नवभारत टाइम्स', 'धर्मयुग', 'श्रीवर्षा', 'रविवार','न्यूज ट्रैक' और 'सारिका' जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं में लगातार लिखा।‘भोजपुर न्यूज़’ अख़बार का संपादन किया। अख़बार और खुद पर कई मुकदमे हो जाने की वजह से उन्होंने वकालत शुरू की।
ये सारी बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि अब से 13 साल पहले 19 अक्टूबर 1997 को रामेश्वर उपाध्याय की हत्या कर दी गई। हत्या के 13 साल बाद, 13 जुलाई को इन बातों का जिक्र इसलिए करना पड़ा क्योंकि उस दौर से इस दौर के बीच का तार कहीं टूट ना जाए। मुझे फ़क्र है बेहद, कि मैं रामेश्वर उपाध्याय का बेटा हूं, और अफसोस, कि उनके जैसे बनने की बचपन से चल रही कोशिश में मैं 99 फीसदी पीछे रह गया। रामेश्वर उपाध्याय से जुड़ी कुछ तस्वीरें और अहमियत वाली कुछ चीज़ें ब्लॉग पर जारी कर रहा हूं। दरअसल मैंने कुछ और लिखा है उनकी याद में, लेकिन यादों को सिलसिलेवार काग़ज़ पर उतारते वक्त काफी लंबा लिख दिया मैंने। अब संकोचवश इसे नहीं जारी कर रहा हूं फिलहाल।
(ऊपर:मीसा के तहत नजरबंदी के
बाद की तस्वीर)
(कमलेश्वर के साथ तमाम लेखकों की ये दुर्लभ तस्वीर है शायद, तस्वीर में बीच में कमलेश्वर हैं, उनके बायें हाथ के ठीक पीछे प्रेम कुमार मणि, उनके हाथ से सटे ठीक बायें मधुकर सिंह, और इन दोनों के बीच में पीछे रामेश्वर उपाध्याय...तस्वीर में दाहिने से दूसरे नंबर पर, जिनका हाथ एक बच्चे के कंधे पर है, वो हैं हृषीकेश सुलभ , सारे लेखकों को मैं दरअसल नहीं पहचान सका हूं अबतक)

                   कथाकार भीष्म साहनी की दृष्टि में....                                      
   
 जमाना सचमुच बदल रहा है। पिछली पीढ़ी के लेखकों का नजरिया आज के यथार्थ के प्रति इतना बेलाग और दो-टूक नहीं हो पाता। शायद इसकी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि उनकी यादें, उनके संस्कार, बीते कल की उनकी आशाएं-आकांक्षाएं उनके आड़े आती रहती हैं और उनकी दृष्टि को प्रभावित करती रहती हैं। आजादी के पहले के देशव्यापी संघर्ष, लोगों के दिलों में पाई जाने वाली छटपटाहट, देश के जीवन में अनेक व्यक्तियों, राजनयिकों के साथ लगाव और आज के जमाने की बीते जमाने के साथ तुलना करने में ही सारा वक्त बीत जाता है।

नई पीढ़ी का लेखक इन पूर्वाग्रहों से मुक्त है। उसकी नजर आज की नजर है।वह आज के जीवन की विडंबनाओं-विसंगतियों को अतीत के संदर्भ में नहीं देखता, उन्हें आज की नज़र से ही देखता है।
इस संग्रह की अधिकांश कहानियों में भी इस दृष्टि की झलक मिलती है। रामेश्वर उपाध्याय उन चंद युवा कहानीकारों में से हैं, जो इसी बेलाग नज़रिये के कारण अपनी रचनाओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कहानियों में- भले ही वे निजी अनुभवों पर आधारित हों,अथवा आस-पास की जिन्दगी में से ली गई हों--एक प्रकार की सादगी, स्पष्टता और पैनापन पाया जाता है। उनकी नजर जिंदगी के अनेक पहलुओं की ओर गई हैं। कहीं हम जेलखाने की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे जा पहुंचते हैं, तो कहीं गली-चौराहे की भीड़ में अपने को खड़ा पाते हैं, जो एक रिक्शा वाले के पिट जाने पर इकट्ठा हो आती है, या एक तरूण लेखक के मनोद्वेगों के दायरे में, जो अपनी पहली रचना के छप जाने पर इतना उत्साहित है कि जीवन की सभी कटुताएं भूल चुका है। ये सभी कहानियां हमारे सामने जीवन का एक प्रमाणिक एवं सटीक चित्र प्रस्तुत करती हैं। पर इतना ही नहीं, सभी के पीछे लेखक का गहरा लगाव, मानवीय सद्भावना और प्रतिबद्धता भी झलकती है। वह समाज का यथावत चित्रण कर देने से ही संतुष्ट नहीं, वरन परिवर्तन की उन आदतों, ध्वनियों को भी सुनता है,जो बढ़ते जुलूसों की पदचाप में ही नहीं, जेल के सींखचों के पीछे पाए जाने वाली सन्नाटे में भी सुनाई दे जाती है।


रामेश्वर उपाध्याय की कलम से सशक्त, सुन्दर साहित्य पढ़ने को मिलता रहेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।


---------------भीष्म साहनी

(नोट-भीष्म साहनी की इस टिप्पणी को रामेश्वर उपाध्याय के चर्चित कहानी संग्रह 'दुखवा में बीतल रतिया' किताब से लिया गया है...)

('नागतंत्र के बीच' उपन्यास की भूमिका से नीचे लिखा अंश लिया गया है...ये रामेश्वर उपाध्याय की जिंदगी के सबसे यादगार दिनों में से एक था...)

'13 सितंबर 1978 को आरा जेल-गेट पर मुझसे मिलने कमलेश्वर, अमरकांत, अजित पुष्कल, मधुकर सिंह और पचास से ऊपर लेखक मित्र आए थे....और उन्होंने मेरे संबंध में यह धारणा बना ली थी कि मैं जेपी की संपूर्ण क्रांति का आदमी होकर जेल में हूं...लेकिन मैं ऐलानिया तौर पर कहना चाहता हूं कि हमारा संबंध वामपंथी ताकतों से था और हम अपनी सही समझदारी के साथ आंदोलन में थे। हां, हमारा दुर्भाग्य यह जरूर रहा कि वामपंथी ताकतें तत्काल कुछ कर नहीं सकीं और नेतृत्व उनके हाथ से निकल जाने के कारण हमें भी संपूर्ण क्रांति का आदमी करार दिया गया।....'
                                                            -रामेश्वर उपाध्याय

(कुछ और तस्वीरें खंगालने के बाद जारी करूंगा उन्हें, और हो सका तो संस्मरण भी जिसे लंबा होने की वजह से आज जारी नहीं कर रहा हूं...)

17 comments:

  1. आलोक कुमार अप्पूJuly 12, 2010 at 7:13 PM

    बहुत बढ़िया...सबसे पहले मै भावभिनी श्रृदांजली अर्पित करता हूं...हां ये सही है कि वो हमारे बीच नहीं है.लेकिन उनकी लिखी हुई किताबे,उपन्यास वो सब मौजूद है जो उनकी मौजूदगी दर्ज कराती है...वे है हमारे बीच ना सहीं लेकिन हमारे दिल में जरुर है... धन्यवाद सर आपने बहुत अच्छे तरह से इसे प्रस्तुत किया...

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  2. बहुत अच्छी जानकारी दी है अपने पापा के बारे मे उन्हें विनम्र श्रद्धाँजली। धन्यवाद।

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  3. मुझे याद है जब पहली बार "दुखवा में बीतल रतिया" किताब मेरे हांथ में आई थी और जब तक रही मैं कई बार रोई...कैसा था वो ज़माना...कमियों में गुज़ारा करते हुए भी समाज की दिशा बदलने की जबर्दस्त इच्छाशक्ति,कई बार उनके पात्रों में अंकल की झलक देखी मैने..और इन तस्वीरों में वो धुंधला चेहरा साफ दिख रहा है। गर्व है हमें भी कि इस महान व्यक्ति का अंश -अमृत उपाध्याय...हमारा दोस्त है। उनकें सपनो को साकार करो यही दिली चाह है...उन्हे भाव-भीनी श्रद्धांजली।

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  4. बेहद दिलचस्प और मार्मिक। आपने अपने पिताजी से जुड़े संस्मरण को लिखने का जो वायदा किया है, उम्मीद है उसे जल्द निभाएंगे।

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  5. बहुत अच्छा लागल भईया पढ़ के जानकारी...

    चाचा जी से जुड़ल संस्मरण के भी जरूर लिखीं, इंतेजार बा....

    चाचा के हमरा तरफ से श्रद्धांजली....

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  6. Yeh bahoot hi khubsoorat sardhanjali hai ek bete ki apne pita ke liye. kyunki aaj ke samay mai sanskaar kamjor padte ja rahe ahi aur aisi mai khoobsurat yado ko sanjona bahoot mahatwapurn hai. ishwar kare aap yu hi kamyabi ki rah badhte rahe apne pita ke ashirwad ke saath.

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  7. निखिल आनंद गिरिJuly 13, 2010 at 5:27 AM

    पिता पर बहुत कम लिखा गया है, मां की तुलना में...जितना लिखा गया है, उसमें ये लेख सबसे संजीदा है.....नमन आपके पिताजी को...

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  8. रामेश्वर उपाध्याय जी की मैने दो किताबें, नागतंत्र के बीच और दुखवा में बीतल रतिया पढ़ी है... और उन किताबों को पढ़ने से पता चलता है कि वो हमारे दौर के कितने बड़े साहित्यकार,पत्रकार थे... और ये भी कि आज के वैसे दौर में जहां व्यक्तिगत स्वार्थ और पूंजी की हुक्मरानी हावी होती जा रही है... शोषितों वंचितों की आवाज उठाने वाले कम होते जा रहे हैं... उनका न होना कितनी बड़ी क्षति है... सिर्फ उनके घर परिवार के लिए ही नहीं... समाज और देश के लिए भी... उनके लिए जिनकी आवाज को अपने लिखे में शामिल किया... जिनके पक्ष में हमेशा खड़े रहे... ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई बेहद मुश्किल है... उन्हे भावभीनी श्रद्धांजलि

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  9. रामेश्वर उपाध्याय जी की मैने दो किताबें, नागतंत्र के बीच और दुखवा में बीतल रतिया पढ़ी है... और उन किताबों को पढ़ने से पता चलता है कि वो हमारे दौर के कितने बड़े साहित्यकार,पत्रकार थे... और ये भी कि आज के वैसे दौर में जहां व्यक्तिगत स्वार्थ और पूंजी की हुक्मरानी हावी होती जा रही है... शोषितों वंचितों की आवाज उठाने वाले कम होते जा रहे हैं... उनका न होना कितनी बड़ी क्षति है... सिर्फ उनके घर परिवार के लिए ही नहीं... समाज और देश के लिए भी... उनके लिए जिनकी आवाज को अपने लिखे में शामिल किया... जिनके पक्ष में हमेशा खड़े रहे... ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई बेहद मुश्किल है... उन्हे भावभीनी श्रद्धांजलि

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  10. anandvardhan priyavatsalamJuly 13, 2010 at 12:14 PM

    bhai, aapne ekdum bhawuk kar diya. achi shradhanjali k bahaane bahut si jankari mili aur durlabh taswire bhi dekhne ko mili.tussi great ho amrit

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  11. इस लेख और इसमें मौजूद तस्वीरों का आकाश पकड़कर समय के पार उस दौर में उतर गया कहीं। मीसा की नज़रबंदी के बाद की तस्वीर में फैली धूप थोड़ी मलीन लगी और ठंडी भी बनिस्पत उसके जो चाचा जी के चेहरे से टकराकर लौट रही है। और हां...वो जो मुस्कुराहट दाढ़ी के पीछे से झांक रही है वही तो है उम्मीद...और जब तक ये मुस्कराहट है कलम से क्रांति की गुंजाइश कायम है। और ये बात भी यकीन के साथ कह सकता हूं अमृत, ये मुस्कुराहट एक पवित्र आत्मा का वो शीतल स्पर्श है जो तख्त-ओ-ताज हिला सकता है और हिंसक पशुओं को अपनी हरारत से पिघला सकता है। इस मुस्कुराहट को मैने आपमें देखा है इसे ज़िंदा रखिए। चाचा जी को मेरा शत् शत् नमन।

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  12. मैं अपनी सहयोगी अभिलाषा से पूरी तरह से सहमत हूं...

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  13. आप सभी को शुक्रिया..जल्दी ही संस्मरण ब्लॉग पर जारी करूंगा..

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  14. Rameshwar upadhyay hamare liye jinda rah pane ka ehsas aur takat bankar har lamha saath hote hain aaj bhi.umra ke jitne ssal unka saath raha hamne unhen jana to sirf papa ke rup me!Batur rachnakar aur samaj me parivartan ka sahas kar usse takrajane wale vyktitwa ke rup me unke shakhshiyat ke nai khoj ka tumhara ye prayas sine me utar gaya.13 july ka ye nayab tohfa pakar maa ki aankhen bhar aain aur chehre par garva ka bhav utar aaya hai....tumhari didi.

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  15. Aaj blog padhakar aankhe nam ho gayi. Amrit chcha jee ko to maine dekha nahi par tumhare sath rahakar maine unhe kafi karib se jana hain. Par aaj blog padh kar aur unki tasveerein dekhakar unko aur kareeb se jana. Mere khyal se uneke janamdivas par ye sabse nayab tohfa hain.Aage tumse unki jeevan se judi aur bhi jankariyo ki ummid hain.....

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  16. (द संडे इंडियन के संपादक ओंकारेश्वर पांडेय जी की ये प्रतिक्रिया ग्लोबल भोजपुरी मूवमेंट की वेबसाइट पर दी गई है...
    -अमृत उपाध्याय)

    भोजपुर के फायर ब्रांड पत्रकार थे रामेश्वर उपाध्याय

    रामेश्वर उपाध्याय से मेरी मुलाकात तब हुई, जब मैं आरा से ही प्रकाशित वीरभूमि और भोजपुर एक्सप्रेस का संपादन करता था.
    प्रतिद्वंदी अखबार का होने के बावजूद रामेश्वर जी जिस आत्मीयता से मिले, मैं उसे कभी नहीं भूल सकता. उनके विचार अलग थे.
    पर हमारे बीच राजनीतिक विचारधारा कभी आड़े नहीं आयी. आरा में रंगमंचीय गतिविधियों के लिए टाऊन हॉल की स्थापना के लिए जब आंदोलन हुआ तो हम सब साथ थे. आरा में अनेक मौकों पर हमें साथ काम करने का मौका मिला. उनके अंदर एक ज्वाला थी. जब बोलते थे, तो आग निकलती थी. जब लिखते थे तो कलम से क्रांति पैदा करने वाली चिंगारियां निकलती थी. उनका असमय चले जाना भोजपुर और भोजपुरी समाज के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.......
    --ओंकारेश्वर पांडेय

    उनके होनहार पुत्र अमृत उपाध्याय ( महुआ टीवी के प्रतिभाशाली एंकर) ने उनकी स्मृति को अपने ब्लॉग में समेटने का भरसक प्रयास किया है.....

    पूरा पढ़िए

    http://bhojpurimovement.ning.com

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  17. 13 साल पहले 19 अक्टूबर 1997 को रामेश्वर उपाध्याय की हत्या कर दी गई।

    ओह.......!!
    आदरणीय रामेश्वर जी को भावभीनी श्रद्धांजलि ....
    उनसे परिचित नहीं थी ...आज आपके ब्लॉग पर राकेश जी की टिपण्णी के माध्यम से पहुंची
    चौहत्तर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका .....मीसा' के तहत नजरबंदी के दौरान ‘नागतंत्र के बीच’ उपन्यास की रचना, चर्चित कहानी संग्रह ‘दुखवा में बीतल रतिया’ और 'गृहयुद्ध' उपन्यास लिखा उन्होंने। बतौर पत्रकार 'नवभारत टाइम्स', 'धर्मयुग', 'श्रीवर्षा', 'रविवार','न्यूज ट्रैक' और 'सारिका' में लेखन .....
    हमारे लिए गर्व की बात है हम आपसे मुखातिव हैं .....

    दरअसल मैंने कुछ और लिखा है उनकी याद में, लेकिन यादों को सिलसिलेवार काग़ज़ पर उतारते वक्त काफी लंबा लिख दिया मैंने। अब संकोचवश इसे नहीं जारी कर रहा हूं ...

    कोई बात नहीं आप उसे छोटे छोटे अंशों में क्रमवार डालते रहे ......

    हाँ तमाम रचनाकारों के साथ सचमुच ये दुर्लभ तस्वीरें हैं .......!!

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