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Wednesday, June 23, 2010

लहरों से लौटकर...

टकरा गए ख्वाब
इस बार,
समंदर की लहरों से
सीधे सीना तान कर,
चकनाचूर भी हो गए,
ना वक्त बचा पाया इन ख्वाबों को
ना परोस पाया कभी
मन के आईने में,
बस कुछ धुंधलकों में दम घुट गया

लहरों में,
टूटकर गिरते ख्वाब के टुकड़ों को
बटोर नहीं सका मैं,
नम आंखों में समेट नहीं सका
यादें,
बस गला भर गया
और फिसल गई हथेली की रेत

                                                                                                                --अमृत उपाध्याय

18 comments:

  1. bahut hi marmik. dil ko chho lenevala.

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  2. आलोक कुमारJune 23, 2010 at 1:12 PM

    बहुत ही जब्बरदस्त...दिल की बात शब्दों में बयान किया...लेकिन क्या किजीएगा यही दुनिया कि रित है...कभी कुछ चीजे चाह कर भी आदमी नहीं पा सकता...देनेवाला एक ही है बस सब कुछ उसके उपर छोड़ देना चाहिए...हम तो बस शतरंज के एक मोहरे भर है...

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  3. बहुत भावपूर्ण!!

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  4. क्या बात है ,गहरे जज्बात ।

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  5. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति.....

    ..................

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  6. ye to mausam hai wahi..dard ka aalam hai wahi..
    ham deewano ke liye nagm-e-maatam hai wahi..
    umda amrit bhai...

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  7. टकरा गए ख्वाब
    इस बार,
    समंदर की लहरों से
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  8. इस कविता को हर कोई अपनी अभिव्यक्ति समझ रहा होगा..कम से कम मैं तो इन्हे अपने लब्ज़ और जज़्बात की तरह देख रही हूं। लिखते रहो...

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  9. बहुत सशक्त अभिव्यक्ति

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  10. क्या हो गया मेरे हंसमुख शेर को....ये कहां-कहां टकराने लगा कि गला भर आया...संभालो मेरे भाई...
    अच्छी कविता....बैठक पर लेख कब से लिखना शुरू कर रहे हैं...

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  11. टकरा कर टूटने का मजा ही अलग होता है निखिल भाई इसलिए जिंदगी में जानबूझ कर टकराना पड़ता है टूटने के लिए, और इसी से तो हम सम्हलते हैं...बहुत जल्द मुलाकात होगी तो तय कर लेंगे कि बैठक में बैठकी के बारे में..

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  12. nice :) i knw its very difficult to express your emotions and let ppl understand with the same warmth & feeling but i feel u conveyed it. keep up the good work.

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  13. tut kar bikhar jane ka khauf chod kar lahro se takra jane ka sahas rakhne wale ye khwab tut kar bhi is kabil hain ki un per naaj kiya jaye!jindagi aur haath se fhisalti ret me antar kuch nahi ek hi sach ki abhivyktiyan hain!
    behad satik aur sarthak panktiyan hai!

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  14. मंगलवार 29 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  15. इन लहरों में इतनी कुव्वत कहां है
    ये तो सीने से टकराकर चिटक जाती हैं

    हम तो बस किनारे पर खड़े होते हैं
    ये बड़ी दूर से हमसे मिलने आती हैं

    ये आपके लिए अमृत....
    ख्वाबों को यूं ही मुसलसल बहने दो
    जम रहा है सब कुछ तो जिंदगी की हलचल रहने दो

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  16. शुक्रिया सर, इन बेहतरीन पंक्तियों में भले ही आपने हलचल रहने देने की सलाह दी हो,लेकिन इन पंक्तियों ने जिंदगी की हलचल को थोड़ा कम जरूर कर दिया है....

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  17. वाह अमृत।......तुम्हे कवि‍ताएं रचते हुए देखना मुझे अह्लाद से भर गया है।

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  18. NICE ONE...
    new comes only when old leaves......
    rest u knw....
    keep it up.....

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