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Monday, November 22, 2010

दर्द का हद से गुजरना है दवा बन जाना



(सुरेंद्र स्निग्ध के साथ ये इंटरव्यू मैंने अक्टूबर 2005 में की थी..इस इंटरव्यू की कई बातें अपील करती हैं..पांच साल बाद भी बिहार में बातों का मिजाज तो बदला है लेकिन स्थितियां कमोबेश पुरानी ही है...लिहाजा इस इंटरव्यू को सार्थकता बरकरार होने की वजह से इसे जारी कर रहा हूं...हो सके तो पढ़िए..)

सुरेंद्र स्निग्ध के साथ अमृत उपाध्याय की बातचीत पर आधारित...(13 अक्टूबर 2005 को प्रभात खबर में प्रकाशित)

क्या सत्ता का पुराना समीकरण टूट रहा है? अगर ऐसा है तो इसके मायने क्या होंगे?

बिहार के राजनीतिक मन-मिजाज को दिल्ली नहीं समझ पा रही है। और तो और समाज का चौथा स्तंभ समझा जाने वाला मीडिया भी बिहार के मन-मिजाज को समझने में पूरी तरह असफल है। एयर कंडीशन स्टूडियो और चैंबर में बैठ कर और कुछ मनगढ़ंत सैंपल के आधार पर राजनीतिक विश्लेषण का तरीका अत्यंत हास्यास्पद है, अवैज्ञानिक तो है ही। प्राचीन समय से ही बिहार का राजनीतिक मन-मिजाज एकदम अलग रहा है। जब पूरे विश्व में राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र की सुगबुगाहट भी नहीं थी, तब वैशाली का गणराज्य, लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में पूरे विश्व को एक नयी दिशा दिखा रहा था।भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई हो या सत्ता में पिछड़ों की भागीदारी का सवाल या ब्राम्हणवाद के खिलाफ लड़ाई का मजबूत गढ़ उत्तर बिहार या उसके पहले भी बौद्धों या जैनियों के द्वारा ब्राम्हणवाद के खिलाफ पूरे विश्व के परिदृश्य में बिहार को केंद्र के रूप में खड़ा किया गया था। बिहार हमेशा ही राजनीति की मुख्यधारा से अलग अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। इसके समाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक कारण हैं। दरअसल सत्ता का स्वरूप जो केंद्र में रहा, वह बिहार में कभी रहा ही नहीं। सोशलिस्टों का भूमि हड़प आंदोलन हो या जय प्रकाश के नेतृत्व में छात्र आंदोलन। इसके पहले भी एकीकृत बिहार का चाहे मुंडाओं का आंदोलन हो या मुसहरी के अत्यंत पिछड़े समुदायों का आंदोलन। सत्ता का वह रूप जो केंद्र के द्वारा निर्धारित था बिहार ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। जाहिर है, सत्ता का नये-नये समीकरण बिहार में बनते और बिगड़ते रहे हैं। अगर आपका आशय लालू यादव की सत्ता से है, तो मेरा निवेदन है कि लालू यादव नये रूप में फिर आ रहे हैं। भले ही उसका नेतृत्व किन्हीं के हाथों में हो, भीतर लालू ही होंगे। क्योंकि लालू अब सिर्फ एक नाम नहीं हैं, वे प्रवृत्ति हैं, नीतीश कुमार हों या रामविलास पासवान, ये सारे लालू के ही अलग-अलग चेहरे हैं।

बिहार की बदहाली, शासनहीनता और अराजकता का परिणाम क्या हुआ? इसके लिए क्या लालू जिम्मेवार हैं? क्या अब बिहार सही दिशा में जाएगा..

आपका दूसरा सवाल बिहार के बाहर, बिहार की छवि को बदनाम करने के लिए एक सोची समझी साजिश के तहत उठाया गया सवाल है। बिहार इस ग्लोब से बाहर का कोई मानचित्र नहीं है। पूरे वैश्विक परिदृश्य पर बद्हाली, पिछड़ापन, अराजकता इन तमाम स्थितियों के नाम पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के द्वारा उठाए गए नाम हैं। परदे के पीछे गैंगमास्टर की भूमिका में हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और अमेरिकी सम्राज्यवाद, जो मुखौटा लगा कर इसके पीछे खड़ा है। बिहार अकेला नहीं है, सम्पूर्ण हिंदी पट्टी इसी बद्हाली जी रहा है। तमाम ऐसे प्रदेश हैं जहां का जीवन कृषि आधारित है, पिछड़ा है। सत्ता की लूट-खसोट में शामिल सभी लोग शातिर अपराधी हैं। कोई अपहरण करता है, कोई अपहरण करवाता है, लेकिन आम जीवन कितना सुरक्षित है? कभी इन परिस्थितियों का भी खुलासा किया जाना चाहिए। ऊपर-ऊपर दिखने वाला शांत जल भीतर से सुनामी को समेटे हुए होता है। बिहार को बद्नाम करने के षड्यंत्र का भी पर्दाफाश होना चाहिए। फिर बिहार की जिस बद्हाली की आप बात कर रहे हैं, उसके लिए किसी का भी दस-पन्द्रह वर्षों का शासन काल दोषी नहीं हो सकता। भारत की आजादी के बाद यहां की राजसत्ता पर बदले हुए रूपों में जो लोग काबिज हुए हैं, सारा कुछ उन्हीं के द्वारा खेला जाने वाला नाटक है। आप बार-बार सत्ता की बात कर रहे हैं। हमलोग तो सपने देखने वाले उस जमात के लोग हैं, जो व्यवस्था परिवर्तन की बात सोचते हैं। गद्दी से जॉन के चले जाने के बाद जगदीश के बैठने से कोई अंतर नहीं हो जाता। जबतक मेहनतकश मजदूरों और किसानों या श्रमशील जनता के हाथों में सत्ता की चाभी नहीं होगी, व्यवस्था नहीं बदलेगी। बदलते रहिए लालू की जगह नीतीश, नीतीश की जगह रामविलास या कि सूरजभान या कि मुन्ना शुक्ला या पप्पू यादव, ये नाम अलग-अलग हैं, लेकिन हैं एक ही व्यक्ति का। और सत्ता पर काबिज होगा यही व्यक्ति।

क्या दलित-अतिपिछड़े बिहार में किसी तीसरे धुव्र के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं? यदि हां, तो ये धुव्र कितना ताकतवर होगा?

आपका यह प्रश्न दरअसल अगले प्रश्न के सपनों के साथ जुड़ा हुआ है। दलित के पर्याय अगर रामविलास हैं, अगर पिछड़ों के पर्याय लालू यादव और नीतीश हैं और अल्पसंख्यकों के पर्याय यदि शहनवाज हुसैन या शहाबुद्दीन हैं तो विश्वास कीजिए की बिहार रसातल की ओर जा रहा है। तीसरे विकल्प की कुंजी वामपंथी सोच वाली राजनीति के पास है लेकिन यह कैसा वामपंथ जो आधा रामविलास के साथ जुड़ा हुआ हो और आधा लालू यादव के साथ। नक्सलबाड़ी आंदोलनों से जुड़े हुए राजनीतिक कार्यकर्ता इतने धड़ों में बंटे हुए हैं, कि समझ में नहीं आता कि तीसरा विकल्प बनाएगा कौन। लेकिन आश्वस्त रहिए अराजकताएं जितनी बढ़ेंगी जनता अपना रास्ता तलाशेगी। जनता महान होती है, आप कुछ क्षण के लिए तो उन्हें जरूर ठग सकते हैं, लेकिन अंधेरे में बहुत दिनों तक भटका नहीं सकते। दर्द जब हद से गुजरेगा तो वह दवा जरूर बनेगा- ‘दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना’

लालू का तिलिस्म टूटने की स्थिति में बिहार में बाजार और मध्यवर्ग की क्या स्थिति होगी?

लालू का तिलिस्म टूटा नहीं है। बिहार के पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों ने लालू में अपने सपनों को देखा। पहली बार बिहार की मध्यवर्गीय शक्तियों को अपनी सही शक्ति का एहसास कराया था लालू ने। बिहार में वर्षों से जड़ जमायी हुई सवर्णवादी मानसिकता और सवर्णों,जमींदारों, पुरोहित-पंडितों के द्वारा इन मध्यवर्ती जातियों का समाजिक और सांस्कृतिक शोषण जितना हुआ था, लालू यादव में उसकी मुक्ति का सपना देखा था। लेकिन जब लालू यादव खुद ही सामंती मन-मिजाज में परिवर्तित हो गए। तंत्र-मंत्र और ढकोसलों में लिप्त हो गए। ब्राम्हणवाद का विरोध करते हुए जिस तरह से स्वयं ब्राम्हणवाद का पर्याय हो गए, बिहार के इस बड़े जनसमुदाय की जन-अकांक्षाओं की आकस्मकि मृत्यु हो गई। इन स्थितियों के बाद लालू यादव का तिलिस्म टूटा तो जरूर, लेकिन नए-नए रूपों में ही तिलिस्म कभी नीतीश कुमार के रूप में तो कभी रामविलास पासवान के रूप में खड़े होते रहे या हो रहे हैं, उनके सामने। लेकिन लोग यह भी जान रहे हैं कि नीतीश कुमार के पीछे किस तरह की शक्ति और मानसिकता खड़ी है। फासीवाद, सांप्रदायिक और जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वालों को संरक्षण देने वाले ये नेता लालू के बदले सत्ता में बैठ तो जरूर जा सकते हैं लेकिन सही विकल्प कभी नहीं दे सकते। मध्यवर्ग और मध्यवर्ती जातियां ऐसे चौराहों पर खड़े हैं, जहां से विकल्प का कोई रास्ता नहीं खुलता।

बिहार में अपराधीकरण के मसले पर क्या स्थिति बनेगी?

अपराध की प्रवृत्ति, पूंजीवाद की उपज है। पूंजीवाद ने बाजार में जिस तरह के सुनहले सपनों की दुकानें सजा रखी हैं और हर किसी में इन सपनों को खरीदने के लिए जिस तरह की बेचैनी पैदा कर दी है। अपराधीकरण इसी बेचैनी का पर्याय है और यह अपराधीकरण सिर्फ बिहार की समस्या नहीं है। बन्धु, यह है ग्लोबल फेनोमेनन। दुख, पीड़ा, परेशानी, दर्द और आंसुओं की भी मार्केटिंग कर रहा है ये पूंजीवाद। हत्याओं की मार्केटिंग हो रही है। अब आप कह रहे हैं कि कैसा होगा अपराधीकरण भविष्य में। तो सिर्फ यही निवेदन किया जा सकता है कि भविष्य में भी ऐसे ही अपराध होंगे।

बिहार नक्सलवाद का मजबूत गढ़ रहा है। लालू को शासक वर्ग की ओर से यहां नक्सलियों के जवाब के रूप में लाया गया था। अब उसके कमजोर होने की स्थिति में नक्सलवाद की क्या स्थिति होगी?

बिहार समाजवादी आंदोलनों का गढ़ रहा है। बिहार में नक्सलबाड़ी आंदोलन को आधारभूमि देने में इसी वर्ण संघर्ष ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। जहां सामंतों और श्रमिकों के बीच(खेतिहर मजदूर सहित) संघर्ष जैसी पृष्ठभूमि रही है। नक्सलबाड़ी आंदोलन वहां उसी रूप में फैला है। लालू यादव को नक्सलियों के खिलाफ खड़ा किया गया था, मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं। मैंने पहले भी कहा है कि लालू यादव बिहार के वृहत्तर पिछड़ी जातियों के सपनों का नाम था। लालू यादव ने युगों से उपेक्षित पिछड़े वर्ग को स्वाभिमान दिया है, यही स्वाभिमान इन जातियों में राजनीतिक भूख के रूप में बदल गया। नक्सलबाड़ी आंदोलनों ने अगर विवेक से काम लिया होता और आधारक्षेत्रों के संघर्षों को विकसित किया होता तो निश्चित रूप से इसके द्वारा लगाई गई फसल या फल को लालू नहीं काट पाते।

पूंजी निवेश से वंचित और आर्थिक विकास की बाजारवादी प्रक्रिया से बहिष्कृत बिहार का क्या भविष्य होगा?

भगौलिक और प्राकृतिक रूप से अविभाजित बिहार धन-धान्य से परिपूर्ण था। झारखंड राज्य अलग होने के बाद शासक वर्ग के हाथों में सोने की थाली मिल गई है। बिहार का अस्सी प्रतिशत राजस्व झारखंड के इलाकों से प्राप्त होता था। शेष बिहार पूरी तरह कृषि आधारित है, और कृषि को आजतक उद्योग का दर्जा हम नहीं दे पाए हैं। शेष बिहार की भगौलिक संरचना देखें, हर साल पूरा इलाका बाढ़ और सूखे से प्रभावित रहा है। जिन इलाकों में नगदी फसलें तैयार हो रही हैं वहां के उद्योग-धंधे वर्षों से बंद हैं, यहां की चीनी मीलें सिर्फ पन्द्रह वर्षों से बंद नहीं हैं, यहां की जूट मील उवर्रक तथा तेलशोधक कारखानें इसलिए बंद नहीं हैं कि बिहार में कोई वैकल्पिक आंतरिक संरचना नहीं बदल रही। गौर कीजिए ये फैक्ट्रियां लगी हैं बिहार में और इसका मुख्यालय है कलकत्ता में। लौह अयस्क निकलता था चाईबासा में, प्रोसेस्ड होता था कलकत्ता में।

नया बिहार बनाने के लिए जरूरत है सिर्फ कल्पनाशीलता की।हर साल आने वाली बाढ़ को नियंत्रित कर उत्पादन की दूसरी दिशाओं में उनकी शक्तियों को लगाया जा सकता है। बिहार में प्रतिभा और श्रम दोनों ही कच्चे माल के रूप में प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हैं, आवश्यकता है उत्पादन के रूप में उन्हें ढाल देने की।
                                                                             

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