Saturday, August 7, 2010

जब मैं सारी रात न सोया

((पांच साल बाद एक बार फिर 'गुनाहों का देवता' पढ़ा..और पढ़ते वक्त एक बार फिर महसूस हुआ कि पहली बार पढ़ते वक्त आंसुओं का बहना यूं ही तो नहीं था...फिर रोया...और फफक कर रोया...'गुनाहों का देवता' से मेरी यादें इस रूप में भी जुड़ी हैं कि इस किताब को पढ़ने के बाद मैंने जो कुछ महसूस किया था, वही मेरी पहली रचना थी, जिसे प्रभात खबर ने प्रकाशित किया....इसलिए अपनी कलम से भले ही ये महत्वपूर्ण लेख ना हो लेकिन मेरे जीवन में इस रचना की अहमियत है...यही सोचकर जारी कर रहा हूं.))


'' और चंदर का हाथ तैश में उठा और एक भरपूर तमाचा सुधा के गाल पर पड़ा..सुधा के गाल पर नीली उंगलियां उपट आईं. वह स्तब्ध, जैसे पत्थर बन गई हो! आंख में आंसू जम गये, पलकों में निगाहें जम गयीं, होठों में आवाजें जम गयीं और सीने में सिसकियां जम गयीं. चंदर ने एक बार सुधा की ओर देखा और कुर्सी पर जैसे गिर पड़ा और सिर पटककर बैठ गया.सुधा कुर्सी के पास जमीन पर बैठ गयी. चंदर के घुटनों पर सिर रख दिया.बड़ी भारी आवाज में बोली-चंदर, देखें तुम्हारे हाथ में चोट तो नहीं आयी''-- गुनाहों का देवता

धर्मवीर भारती का उपन्यास 'गुनाहों का देवता' पढ़ते हुए उसके चरित्रों, खास कर सुधा के प्रति किसी के मन में अपनापन और सम्मान का भाव उत्पन्न होना लाजिमी है.शायद इसीलिए पहली बार इस उपन्यास को पढ़ते हुए ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ़ता गया, मेरी आंखें आंसुओं की गर्माहट को लगातार महसूस करती रहीं. हमारे पुरूष प्रधान समाज में पुरूषों के जीवन में रोने के अवसर, खास कर खुल कर रोने के मौके बहुत कम आते हैं. लेकिन डॉ. धर्मवीर भारती के इस उपन्यास ने मुझे यह मौका देने में कहीं चूक नहीं की. सालों बाद मैंने अपने आंसुओं को बेइजाजत बहते हुए पाया. सयानेपन के बोध से परिचित होने के बाद बचपन में कभी भी सहज भाव से निकल आने वाले आंसू कहीं खो से गये थे. लेकिन इस उपन्यास को पढ़कर मैं रोया और सिर्फ रोया नहीं, फफक-फफक कर रोया. इसके पात्र और घटनाएं मेरे मानस पटल पर किसी मित्र-बंधु की तरह अंकित हो गये. तब से जाने कितने दिन-रात चंदर, सुधा, बिनती, डॉ. शुक्ला, गेसू, बिसरिया पम्मी और कैलाश के साथ बीते हैं. बिनती की बातों से हंसा हूं, चंदर की दलीलों में उलझा हूं और सुधा के कष्ट से मेरे हृदय ने वेदना महसूस की है. चंदर और सुधा के रिश्ते अजब हैं. चंदर गर्व की परतों से बना, सूरज का एक गोला है.उसमें सुबह की लालिमा है, दोपहर का तीखापन है, कहीं तिरछी किरणें बादलों के बीच से आंख-मिचौली करती हैं, तो कहीं सांझ का धूसर सौंदर्य है. उसके व्यक्तित्व में विविधता है. लेकिन सुधा चंद्रमा है. बिल्कुल शीतल, चंद्रमा की तरह उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है. कभी बचपना है, कभी समझदारी है, कभी वह अपने उम्र के हिसाब से बड़ी बातें किया करती है, तो कभी बच्चों सी छोटी-छोटी शिकायतों में उलझी रहती है. वह मानती है कि वह सूरज(चंदर) के प्रकाश से प्रकाशमान है. वह खुद को तुच्छ समझती है. सुधा चंदर को कभी मां की ममता देती है, कभी बहन की तरह तकरार करती है, कभी पत्नी का दुलार देती है, तो कभी दोस्त जैसा हौसला और संरक्षण. सुधा एक ऐसी तेज है, जो देखने पर दिखती नहीं और नहीं देखने पर बेचैनी बढ़ जाती है. सुधा के चरित्र ने मुझे इतना विवश कर मुझे अपनी ओर खींचा है कि उसकी बातें मन में दोहराने से कतराता रहा हूं, फिर भी उसकी बातें याद रह गयीं हैं. चंदर सुधा का निर्माता नहीं हो सकता, क्योंकि सुधा के ब्याह के साथ ही चंदर का नैतिक पतन आरंभ होता है, पर सुधा वासना के कीचड़ में-जिसे वह नरक समझती थी- रह कर भी कमल की तरह पवित्र रही. चंदर वासना के बहाव में बहता है और तब सुधा के ख्याल को भी वह झटकने लगता है. समय की आंधी से उठे दोष के रेतीले टीले मनुष्य के व्यक्तित्व को इतना जकड़ लेते हैं कि वह उसके सामने घुटने टेक देता है. जैसा चंदर के साथ हुआ वह साधारण आदमी के लिए स्वाभाविक है. इसलिए चंदर सुधा का निर्माता नहीं था. सुधा का स्वभाव उसकी अपनी प्रकृति की देन थी. उसकी पवित्रता में दिखावा नहीं था. लेकिन चंदर समाज,लोग, मजबूरी, प्रतिष्ठा, स्वाभिमान जैसे शब्दों की परिभाषाओं से बंधा था. दरअसल चंदर सुधा द्वारा निर्मित था. सुधा के कारण वह दृढ़ था, इस अहम के साथ कि वह सुधा को आदर्शों के अनुसार ढाल रहा है. सुधा और चंदर में आत्मा और शरीर जैसा संबंध था और सुधा का ब्याह हो जाता है, तब यह आत्मा और शरीर एक दूसरे से अलग हो कर अस्तित्वहीन से हो जाते हैं. उपन्यास के आखिर में चंदर और सुधा की भेंट होती है. चंदर उसके जीवन के आखिरी दिन उसे देख पाता है. अंतत: सुधा अपने अल्हड़पन और समझदारी को समेटे चंदर की गोद में सिर रख कर हमेशा के लिए विदा हो जाती है. उपन्यास के इन पन्नों को पढ़ने के बाद दो दिनों तक मैं असहज रहा, जैसे कोई अपना हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया हो, जैसे सालों लंबे साथ के बाद कोई पूरी उम्र नहीं मिलेगा. मैं लड़की की शादी में विदाई के बाद घर में फैले सूनेपन से भर उठा था. आंखें सावन-भादो हो कर सूज गयीं और देह तपने लगी. पूरे दिन कुछ खा न सका, शरबत पी, तो सुधा की शरबत याद आयी, चाय पी, तो चंदन की शरारत याद आयी.....


मेरे शब्द कहीं खो गये थे, मैं इसे पढ़ कर रोता था और बंद कर देने पर आकुल होने लगता था. हार कर मैंने डायरी खोल ली और बस इतना लिख पाया-
 आज मैं सारी रात न सोया,
  होठों को आंसू से धोया,
 सिसकियों ने समझाना चाहा,
 फिर भी दिल का दर्द ना खोया,
आज मैं सारी रात न सोया

5 comments:

  1. मित्र, ' गुनाहों का देवता ' मैं किशोरवय में पढ़ा था. तब तकिये भीग गए थे. इस उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते हम कथानक के खुद एक चरित्र बन जातें हैं. और उनके सुख-दुःख से हमारा सरोकार जुड़ जाता है. - गोपाल.

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  2. भईया गुनाहों का देवता ऐसी किताब हीं है कि हर किसी को वो संवेदना से भर देती है। मैनें चंद किताबें हीं पढ़ी हैं, जिनमें से एक गुनाहों का देवता है। आपके ब्लॉग को पढ़ते समय वो सारे पात्र जिवंत हो उठे हों जैसे.... सुधा का वो त्याग, विनती का अल्हड़पन, और चंदर.......
    लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि उस पूरी किताब को पढ़ने के बाद मैं भावनाओं से सरोबार हुआ था, लेकिन आज इस लेख को पढ़ने के बाद कुछ वैसी ही भावनाएं पुलकित हो गईं हैं।
    जिसने भी गुनाहों का देवता पढ़ा होगा.....वो यहीं कहेगा....

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  3. गुनाहों का देवता, वाकई भावुक कर देनेवाला उपन्यास है... लेकिन इस देवता के गुनाह कैसे थे... इसे जानने के लिए धर्मवीर भारती की पत्नी कांता भारती का उपन्यास रेत की मछली भी जरुर पढ़ना चाहिए... शिल्प की दृष्टि से रेत की मछली गुनाहों के देवता के बरअक्स बहुत कमतर है... लेकिन वो गुनाहों को जस्टीफाई करने की कोशिश करनेवाला नहीं, बल्कि महनता के मुखौटे के पीछे छिपे चेहरे को परत दर परत उधेड़ कर कलई खोलने वाला उपन्यास है...

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  4. रेत की मछली जरूर पढूंगा लेकिन मैं लेखक की निजी जिंदगी को किनारे कर सिर्फ रचना के तौर पर कहानी को पढ़ने की वकालत करता हूं, हो सकता है किसी लेखक के व्यक्तित्व में तमाम खामियां हों लेकिन उसकी रचना को इससे जोड़कर देखना मुझे वाजिब नहीं लगता...रेत की मछली पढ़कर आपसे जरूर इस पर चर्चा होगी

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  5. गुनाहों का देवता - बिना किसी शक-ओ-शुबहा के - अच्छे पात्रों के साथ एक अच्छी कहानी है.. कहानी का बहाव सिलसिलेवार है.... फिलास्फ़ी के बहुत ज्यादा झटके नही है.. मुझे लगता है की गुनाहों का देवता सोलह से बीस साल के लड़के लड़कियों का बाईबिल है, जो इसे पढ़ते है और तकिये में मुंह छिपा कर रोते है.. और वही लड़के लड़कियां जब जब पैंतीस साल के हो जाते है और दुबारा इस उपन्यास को पढ़ते है तो सोचते है की पहली बार हम रोये क्यों थे....यकीन मानिये मै ऐसे कई लोगों को जानता हूं.. ये बात कह के इस मै उपन्यास की महत्ता को कम नही करना चाहता हूं ... दूसरी बात ये की इस उपन्यास में साहित्य का कितना पुट है ये कह के मै किसी नयी बहस को जन्म नही देना चाहता, लेकिन कहानी बेशक दमदार है, .. अपने आप में एक अनूठी कहानी है.. अगर इसी कहानी को थोड़ा फ़ेर बदल के बाद शेखर-एक जीवनी के शेखर और शशि से जोड़ कर देखा जा सके तो फ़ासले की लकीर बहुत मोटी नही दिखायी देगी.. धर्मवीर जी ने इस उपन्यास के सहारे कई संदेश और देने की कोशिश की है...जब इस उपन्यास को थोड़ा और गौर से और डूब कर पढ़ेंगे तो आपको चंदर और बर्टी (पम्मी का पगला भाई) की सोच में कई समानताये भी मिलेंगी जायेंगी - प्रतिकात्मक क्रियावाद का एक उदाहरण, बिना कहे बहुत कुछ कह देने की एक कला.. शायद वो यही कहना चाहते होंगे की क्या कोई पागल ही किसी को टूट कर चाह सकता है ?

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